मुलायम परिवार में कलह के बीच महागठबंधन का खाका तैयार

यादव परिवार में हो रही सिर फुटव्वल के बीच उत्तर प्रदेश की सियासी चौसर अब दिल्ली में बिछनी शुरू हो गई है. मुलायम सिंह ने पासा फेंकने के लिए दिल्ली भेजा है छोटे भाई शिवपाल यादव को और मकसद है 2017 में बीजेपी और बीएसपी से जंग लड़ने के लिए महागठबंधन का निर्माण. महागठबंधन में जिन पार्टियों को जोड़ने की तैयारी है वो हैं-

समाजवादी पार्टी

कांग्रेस पार्टी

जनता दल यूनाइटेड

राष्ट्रीय लोकदल

और बहुजन समाज स्वाभिमान संघर्ष समिति जैसे कुछ छोटे दल

शिवपाल ने बुधवार को जेडीयू नेता शरद यादव और महासचिव केसी त्यागी से दिल्ली में मुलाकात की. शुक्रवार को शिवपाल ने राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह से भी मुलाकात की. सूत्रों के मुताबिक शिवपाल कांग्रेस नेताओं के संपर्क में भी हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि शिवपाल 5 नवंबर को होने वाले समाजवादी पार्टी के स्वर्णजयंती कार्यक्रम का न्यौता देने दिल्ली आए हैं. लेकिन राजनीति में जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है वो दिखता नहीं.

सत्ता के गलियारों में हो रही फुसफुसाहट के मुताबिक, इन तमाम मुलाकातों का सबब है बिहार चुनावों की तर्ज पर एक महागठबंधन बनाना. खास बात ये है कि खेल में शामिल तमाम पार्टियां अगर खुलकर स्वीकार नहीं कर रहीं तो खुलकर इंकार भी नहीं कर रहीं. क्विंट हिंदी ने इन तमाम खेमों में जाकर पर्दे के पीछे का खेल जानने की कोशिश की.

कांग्रेस के मीडिया सेल के इंचार्ज रणदीप सुरजेवाला सोनिया और राहुल गांधी की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का दावा तो करते हैं लेकिन महागठबंधन की संभावनाओं को नहीं नकारते. सुरजेवाला के मुताबिक-

भविष्य के गर्भ की कोई तस्वीर मुझे आज नजर नहीं आती. कल कौन किससे मिलने वाला है कम से कम मुझे उसकी जानकारी नहीं है.

दरअसल महागठबंधन में शामिल होने के कुछ फायदे हैं तो कुछ उलझनें भी हैं.

(फोटो: Hardeep Singh/The Quint)

कांग्रेस की उलझन-

मुख्यमंत्री के तौर पर उतारी गईं शीला दीक्षित का क्या होगा?

प्रियंका पूरे गठबंधन के लिये प्रचार करेंगी या सिर्फ कांग्रेस के लिए?

उत्तर प्रदेश में किसान यात्रा के दौरान मुलायम को जमकर कोसने वाले राहुल गांधी गठबंधन में शामिल होने को कैसे सही साबित करेंगे?

गठबंधन के फायदे-

तमाम चुनावी सर्वे में आखिरी नंबर पर चल रही कांग्रेस पार्टी को जातिगत समीकरणों का फायदा मिलेगा

कांग्रेस के कमजोर संगठन को दूसरी पार्टियों के गठबंधन से मजबूती मिलेगी

अब बात करते हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर असरदार छोटे चौधरी यानी अजित सिंह की जो पहले ही जेडीयू नेता नीतीश कुमार के साथ एक मंच से महागठबंधन की पुकार लगा चुके हैं.

(फाइल फोटो: PTI)

हरित प्रदेश के 20 जिलों में विधानसभा की 122 सीटें हैं. अजित की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल यानी आरएलडी का फिलहाल 10 सीटों पर कब्जा है. 2012 के चुनावों में आरएलडी 12 सीटों पर नंबर दो पर थी. महागठबंधन का हिस्सा बनने के लिए अजित 40-45 सीटों पर दावा ठोकेंगे. वैसे साल 2002 के बाद से चौधरी ने कोई चुनाव अकेले नहीं लड़ा है.

आरएलडी की उलझन

इन दिनों अंदरूनी घमासान से जूझ रही समाजवादी पार्टी का साथ नुकसान भी पहुंचा सकता है.

सत्ताधारी दल से हाथ मिलाकर सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा सकता है.

अजित कांग्रेस पार्टी को महागठबंधन का हिस्सा बनाना नहीं चाहते.

गठबंधन के फायदे

आरएलडी के जाट वोट बैंक की सबसे बढ़िया जुगलबंदी मुस्लिम वोट के साथ बनती है.

मुस्लिम वोटरों में समाजवादी पार्टी की साख का फायदा मिलेगा.

हालांकि नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू का उत्तर प्रदेश में कोई जनाधार नहीं है लेकिन वो भी इस गठबंधन की अहम खिलाड़ी के तौर पर दिखना चाहती है. जेडीयू नेता के सी त्यागी ने क्विंट हिंदी को कहा,

नीतीश कुमार इस वक्त देश में सेक्यूलर पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा चेहरा हैं. ऐसे में बीजेपी को हराने के लिए हम यूपी में भी बड़ा रोल निभा सकते हैं.

पूरी तरह महागठबंधन के पक्ष में होने के बावजूद जेडीयू के एक खेमे में छोटी सी उलझन भी है.

जेडीयू की उलझन

पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनावों के वक्त बने महागठबंधन को मुलायम सिंह ने आखरी वक्त पर गच्चा दे दिया था.

कुछ नेताओं को लगता है कि कहीं इस बार भी मुलायम कोई खेल ना कर दें.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फोटो: Twitter/@NitishKumar)

गठबंधन के फायदे

सेक्यूलर नेता के तौर पर नीतीश कुमार की छवि मजबूत होगी तो केंद्र की राजनीति में उनका दावा बढ़ेगा.

बीजेपी हारी तो मोदी के साथ चल रहे मनोवैज्ञानिक युद्ध में नीतिश को एक और जीत मिलेगी.

उधर मुस्लिम और यादव जुगलबंदी के करीब 27 फीसदी वोट बैंक पर पकड़ रखने वाली समाजवादी पार्टी अगर महागठबंधन बनाने में कामयाब होती है तो वो पारिवारिक घमासान के दौरान घायल हुई छवि पर मरहम लगाने में कामयाब होगी.

बीएसपी की तरफ खिसक रहा मुस्लिम वोट थोड़ा ठहरेगा और जाटों-स्वर्णों का सहारा मिलेगा. लेकिन नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव की इस पूरी कवायद के बीच एक बड़ा सवाल वोटर के सामने पेंडुलम की तरह झूल रहा है. बाहर वाले तो ठीक लेकिन घरवालों का क्या होगा? क्या यादव परिवार की बिखरी उंगलियां दोबारा एक मुट्ठी की शक्ल ले पाएंगी? समाजवादी पार्टी टूट तो नहीं जाएगी...?

महागठबंधनकलहमुलायम सिंह यादव

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