पुत्र कामना और पति की दीर्घ आयु के लिए काफी मान्यता है इस मंदिर की

 


हिन्दू धर्मग्रंथों में कृष्णपक्ष की चंद्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी को ‘संकष्टी गणेश चतुर्थी’ के व्रत का विधान निर्दिष्ट है. ऐसी मान्यता है कि इन चतुर्थियों के दिन उपवास रखकर गणोशजी का पूजन तथा रात्रि में चंद्रोदय हो जाने पर चंद्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत व्रत का पारण करने से सब संकट दूर होते हैं. श्रीगणोश को ‘विघ्नेश्वर’ कहा जाता है. प्रत्येक कार्य के प्रारंभ में गणोशजी का स्मरण उसके निर्विघ्न संपन्न होने के उद्देश्य से किया जाता है. श्रीगणोश की पूजा से समस्त देवगणों का पूजन स्वत: हो जाता है, क्योंकि ये ‘गणपति’ कहलाते हैं. शिवपुराण के अनुसार, पार्वती-पुत्र गणोशजी की उत्पत्ति उमा की देह में लगे उबटन से हुई थी.

जबकि ब्रह्मवैवर्तपुराण के कथनानुसार, माता पार्वती को गणेशजी पुत्र के रूप में पुण्यक-व्रत के फलस्वरूप प्राप्त हुए थे. मान्यता जो भी हो, लेकिन पौराणिक ग्रंथ गणपति को प्रणव-स्वरूप बताते हैं अर्थात शिव-पार्वती का पुत्र बनने से पूर्व श्रीगणेश निराकार प्रणव (ॐ) के रूप में थे. शंकर के पुत्र के रूप में उनका गजमुख साकार हुआ.

पुत्र कामना और पति की दीर्घ आयु के लिए व्रत

‘संकष्टी गणेश चतुर्थी’ के दिन पुत्र कामना और पति की दीर्घ आयु के लिए महिलायें व्रत करती हैं. चन्द्रोदय के बाद चन्द्र विम्ब में भगवान गणोश के निमित्त अर्घ्य अर्पित कर व्रती महिलायें व्रत का पारण करती हैं.

धर्म की नगरी काशी के लोहटिया स्थित अति प्राचीन बड़ा गणेश मंदिर में हजारो गणेश भक्तों का हुजूम तड़के सुबह से ही उमड़ पड़ा. माना जाता है कि अपने आप में पूरे देश में यह अनूठा मंदिर है, जहा विघ्नहर्ता अपने विशाल रूप में त्रिनेत्रधारी रूप में विराजमान हैं.

बल, बुद्धि और विद्या के देवता गणेश जी के दर्शन के लिए भक्तो का ताता लगा रहा. भक्तों को पूरा विश्वास है कि आज के पावन दिन गणपति के दर्शन मात्र से उनके परिवार पर विघ्नहर्ता पूरे वर्ष अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखेंगे.

भोले की नगरी काशी में शिव पुत्र गणेश जी की महत्ता अन्य तीर्थो और स्थानों से कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है. यही वजह है कि ‘संकष्टी गणेश चतुर्थी’ के दिन हर-हर महादेव से गुन्जायमान रहने वाली काशी नगरी जय गणेश देवा के उद्गोष के साथ पूरे दिन गूंजती रही.

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