देश का असली हीरो: जो पाकिस्तान के 1200 सैनिको पर भारी पड़ा था

ACL Live 1 Aug. 2016 20:38

सेना के जवानों की वीर गाथाओ में अक्सर हम सुनते आ रहे है, कि देश के जांबाजो ने किस तरह से देश के खातिर अपनी वतनपरस्ती को निभाया है. किन्तु हम आपको बता रहे है, आज ऐसे शख्स के बारे में जो न तो देश का सैनिक था और न ही कोई अधिकारी किन्तु वह देश का असली हीरो बन गया. जिसका नाम था रणछोड़ भाई रबारी. जिसने न सिर्फ भारतीय सेना कि मदद कि बल्कि वह अकेला पाकिस्तान के 1200 सेनिको के लिए भारी पड़ा था.

रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे. पेथापुर गथडो जो अब विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है. पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे. और यही अपना गुजर बसर करते थे.

1965 के युद्ध में रणछोड़ भाई ने बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी. वर्ष 1965 के आरंभ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था जिसको लेकर हुई जंग में हमारे 100 सैनिक मारे गए थे. और पाकिस्तानी सैनिको ने कब्ज़ा कर लिया था. उस समय हमारे देश के सेनिको कि एक टुकड़ी जिसमे करीब दस हाजर जवान थे को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ ने सेना का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही समय में वह पंहुचा दिया. इसी के साथ ही रणछोड़भाई ने अपनी चतुराई से इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के लोकेशन का भी पता लगा लिया और सेना ने हमला कर विजय प्राप्त की.

इतना ही नही 1971 के युद्ध में भी उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही.इस युद्ध के समय रणछोड़भाई बोरियाबेट से ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान की ओर गए। घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे. पगी के इनपुट पर भारतीय सेना ने कूच किया. जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया. इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

वे देश के जवानों के लिए एक हीरो बन गए थे. वही रणछोड़ भाई रबारी जनरल सैम माणिक शॉ के भी हीरो थे. और उन्हें बहुत मानते थे. जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अमर हो गए. उनके इस सेवा भाव से प्रेरित होकर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है

सेना के जवानों की वीर गाथाओ में अक्सर हम सुनते आ रहे है, कि देश के जांबाजो ने किस तरह से देश के खातिर अपनी वतनपरस्ती को निभाया है. किन्तु हम आपको बता रहे है, आज ऐसे शख्स के बारे में जो न तो देश का सैनिक था और न ही कोई अधिकारी किन्तु वह देश का असली हीरो बन गया. जिसका नाम था रणछोड़ भाई रबारी. जिसने न सिर्फ भारतीय सेना कि मदद कि बल्कि वह अकेला पाकिस्तान के 1200 सेनिको के लिए भारी पड़ा था.

रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे. पेथापुर गथडो जो अब विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है. पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे. और यही अपना गुजर बसर करते थे.

1965 के युद्ध में रणछोड़ भाई ने बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी. वर्ष 1965 के आरंभ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था जिसको लेकर हुई जंग में हमारे 100 सैनिक मारे गए थे. और पाकिस्तानी सैनिको ने कब्ज़ा कर लिया था. उस समय हमारे देश के सेनिको कि एक टुकड़ी जिसमे करीब दस हाजर जवान थे को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ ने सेना का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही समय में वह पंहुचा दिया. इसी के साथ ही रणछोड़भाई ने अपनी चतुराई से इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के लोकेशन का भी पता लगा लिया और सेना ने हमला कर विजय प्राप्त की.

इतना ही नही 1971 के युद्ध में भी उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही.इस युद्ध के समय रणछोड़भाई बोरियाबेट से ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान की ओर गए। घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे. पगी के इनपुट पर भारतीय सेना ने कूच किया. जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया. इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

वे देश के जवानों के लिए एक हीरो बन गए थे. वही रणछोड़ भाई रबारी जनरल सैम माणिक शॉ के भी हीरो थे. और उन्हें बहुत मानते थे. जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अमर हो गए. उनके इस सेवा भाव से प्रेरित होकर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है

सेना के जवानों की वीर गाथाओ में अक्सर हम सुनते आ रहे है, कि देश के जांबाजो ने किस तरह से देश के खातिर अपनी वतनपरस्ती को निभाया है. किन्तु हम आपको बता रहे है, आज ऐसे शख्स के बारे में जो न तो देश का सैनिक था और न ही कोई अधिकारी किन्तु वह देश का असली हीरो बन गया. जिसका नाम था रणछोड़ भाई रबारी. जिसने न सिर्फ भारतीय सेना कि मदद कि बल्कि वह अकेला पाकिस्तान के 1200 सेनिको के लिए भारी पड़ा था.

रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे. पेथापुर गथडो जो अब विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है. पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे. और यही अपना गुजर बसर करते थे.

1965 के युद्ध में रणछोड़ भाई ने बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी. वर्ष 1965 के आरंभ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था जिसको लेकर हुई जंग में हमारे 100 सैनिक मारे गए थे. और पाकिस्तानी सैनिको ने कब्ज़ा कर लिया था. उस समय हमारे देश के सेनिको कि एक टुकड़ी जिसमे करीब दस हाजर जवान थे को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ ने सेना का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही समय में वह पंहुचा दिया. इसी के साथ ही रणछोड़भाई ने अपनी चतुराई से इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के लोकेशन का भी पता लगा लिया और सेना ने हमला कर विजय प्राप्त की.

इतना ही नही 1971 के युद्ध में भी उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही.इस युद्ध के समय रणछोड़भाई बोरियाबेट से ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान की ओर गए। घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे. पगी के इनपुट पर भारतीय सेना ने कूच किया. जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया. इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

वे देश के जवानों के लिए एक हीरो बन गए थे. वही रणछोड़ भाई रबारी जनरल सैम माणिक शॉ के भी हीरो थे. और उन्हें बहुत मानते थे. जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अमर हो गए. उनके इस सेवा भाव से प्रेरित होकर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है

सेना के जवानों की वीर गाथाओ में अक्सर हम सुनते आ रहे है, कि देश के जांबाजो ने किस तरह से देश के खातिर अपनी वतनपरस्ती को निभाया है. किन्तु हम आपको बता रहे है, आज ऐसे शख्स के बारे में जो न तो देश का सैनिक था और न ही कोई अधिकारी किन्तु वह देश का असली हीरो बन गया. जिसका नाम था रणछोड़ भाई रबारी. जिसने न सिर्फ भारतीय सेना कि मदद कि बल्कि वह अकेला पाकिस्तान के 1200 सेनिको के लिए भारी पड़ा था.

रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे. पेथापुर गथडो जो अब विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है. पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे. और यही अपना गुजर बसर करते थे.

1965 के युद्ध में रणछोड़ भाई ने बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी. वर्ष 1965 के आरंभ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था जिसको लेकर हुई जंग में हमारे 100 सैनिक मारे गए थे. और पाकिस्तानी सैनिको ने कब्ज़ा कर लिया था. उस समय हमारे देश के सेनिको कि एक टुकड़ी जिसमे करीब दस हाजर जवान थे को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ ने सेना का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही समय में वह पंहुचा दिया. इसी के साथ ही रणछोड़भाई ने अपनी चतुराई से इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के लोकेशन का भी पता लगा लिया और सेना ने हमला कर विजय प्राप्त की.

इतना ही नही 1971 के युद्ध में भी उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही.इस युद्ध के समय रणछोड़भाई बोरियाबेट से ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान की ओर गए। घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे. पगी के इनपुट पर भारतीय सेना ने कूच किया. जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया. इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

वे देश के जवानों के लिए एक हीरो बन गए थे. वही रणछोड़ भाई रबारी जनरल सैम माणिक शॉ के भी हीरो थे. और उन्हें बहुत मानते थे. जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अमर हो गए. उनके इस सेवा भाव से प्रेरित होकर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है

सेना के जवानों की वीर गाथाओ में अक्सर हम सुनते आ रहे है, कि देश के जांबाजो ने किस तरह से देश के खातिर अपनी वतनपरस्ती को निभाया है. किन्तु हम आपको बता रहे है, आज ऐसे शख्स के बारे में जो न तो देश का सैनिक था और न ही कोई अधिकारी किन्तु वह देश का असली हीरो बन गया. जिसका नाम था रणछोड़ भाई रबारी. जिसने न सिर्फ भारतीय सेना कि मदद कि बल्कि वह अकेला पाकिस्तान के 1200 सेनिको के लिए भारी पड़ा था.

रणछोड़ दास अविभाजित भारत के पेथापुर गथडो गांव के मूल निवासी थे. पेथापुर गथडो जो अब विभाजन के चलते पाकिस्तान में चला गया है. पशुधन के सहारे गुजारा करने वाले रणछोड़भाई पाकिस्तानी सैनिकों की प्रताड़ना से तंग आकर बनासकांठा (गुजरात) में बस गए थे. और यही अपना गुजर बसर करते थे.

1965 के युद्ध में रणछोड़ भाई ने बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी. वर्ष 1965 के आरंभ में पाकिस्तानी सेना ने भारत के कच्छ सीमा स्थित विद्याकोट थाने पर कब्जा कर लिया था जिसको लेकर हुई जंग में हमारे 100 सैनिक मारे गए थे. और पाकिस्तानी सैनिको ने कब्ज़ा कर लिया था. उस समय हमारे देश के सेनिको कि एक टुकड़ी जिसमे करीब दस हाजर जवान थे को तीन दिन में छारकोट तक पहुंचना जरूरी हो गया था, तब रणछोड़ ने सेना का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही समय में वह पंहुचा दिया. इसी के साथ ही रणछोड़भाई ने अपनी चतुराई से इलाके में छुपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों के लोकेशन का भी पता लगा लिया और सेना ने हमला कर विजय प्राप्त की.

इतना ही नही 1971 के युद्ध में भी उनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही.इस युद्ध के समय रणछोड़भाई बोरियाबेट से ऊंट पर सवार होकर पाकिस्तान की ओर गए। घोरा क्षेत्र में छुपी पाकिस्तानी सेना के ठिकानों की जानकारी लेकर लौटे. पगी के इनपुट पर भारतीय सेना ने कूच किया. जंग के दौरान गोली-बमबारी के गोला-बारूद खत्म होने पर उन्होंने सेना को बारूद पहुंचाने का काम भी किया. इन सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति मेडल सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

वे देश के जवानों के लिए एक हीरो बन गए थे. वही रणछोड़ भाई रबारी जनरल सैम माणिक शॉ के भी हीरो थे. और उन्हें बहुत मानते थे. जनवरी-2013 में 112 वर्ष की उम्र में रणछोड़भाई रबारी अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अमर हो गए. उनके इस सेवा भाव से प्रेरित होकर भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने उत्तर गुजरात के सुईगांव अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक बॉर्डर पोस्ट को रणछोड़दास पोस्ट नाम दिया है

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