Show Mobile Navigation

लेबल

,

ओशो ..का सोवै दिन रैन

admin - 2:45:00 am

ऐसा हुआ कि चार्ली चैपलिन के एक जन्म दिन पर उसके मित्रों ने सोचा : एक प्रतियोगिता की जाए, जिसमें सारी दुनिया के अभिनेता भाग ले सकें। अभिनय करना है चार्ली चैपलिन का। लंदन में प्रतियोगिता आयोजित होगी। पहले अलग — अलग देश में आयोजित होगी। वहां से जो प्रथम चुने जाएंगे, वे आकर लंदन में प्रतियोगिता करेंगे। सौ लोग चुने जाएंगे। इन सौ में से फिर एक चुना जाएगा, जो चार्ली चैपलिन का अभिनय कर सके।
चार्ली चैपलिन को मजाक सूझी। इंग्लैंड में होती प्रतियोगिता में वह भी पीछे से प्रवेश कर गया; किसी दूसरे नाम से प्रवेश कर गया। उसे तो पक्का भरोसा था कि प्रथम पुरस्कार मुझे मिलेगा ही। चार्ली चैपलिन ही चार्ली चैपलिन का अभिनय करे, तो फिर किसी दूसरे को प्रथम पुरस्कार कैसे मिल सकता है? उसकी गलती थी। जब निर्णय हुए तो वह बहुत हैरान हुआ। उसको नंबर दो का पुरस्कार मिला, प्रथम कोई और मार ले गया था। चार्ली चैपलिन —— नंबर दो!
यह असंभव मालूम होती है घटना, मगर घटी। यह मजाक खूब गहरा, अपने पर ही पड़ गया मजाक। जब पता चला तो आयोजकों को भी भरोसा नहीं आया कि हमने जिसको चुना है नंबर दो, वह चार्ली चैपलिन है।
कारण साफ है। चार्ली चैपलिन ने तो कोई अभ्‍यास किया नहीं। चार्ली चैपलिन ही था, तो अभ्‍यास क्या करना है? जैसा था, वैसा चला गया। जो भी करेगा वही चार्ली चैपलिन का अभिनय है। लेकिन जिसने अभिनय किया, उसने चार्ली चैपलिन के सारे अभिनयो का अध्ययन किया, सारी फिल्में देखीं, एक — एक भाव — भंगिमा का ठीक — ठीक अभ्‍यास किया। वे भाव — भंगिमाएं चार्ली चैपलिन की तो सहजस्फूर्त थीं, लेकिन जिसने अभ्‍यास किया उसने उनमें और — और कुशलता लायी, उनको और सजाया।
इसलिए इसको समझो : अगर तुम्हें कोई व्यक्ति किसी दूसरे को रत्ती — रत्ती दोहराता मिल जाए, तो समझ लेना नकली है। और यह भी हो सकता है कि दोहरानेवाला बड़ी कुशल से दोहराए। दोहरानेवाला बहुत कुशल हो सकता है, खूब रिहर्सल किया हो सकता है, उसकी भाव — भंगिमाएं बिल्कुल परिपूर्ण हो सकती हैं। कभी — कभी तो ऐसा भी हो जाता है कि असली से ज्यादा परिपूर्ण मालूम हो सकती हैं नकली की भाव — भंगिमाएं। क्योंकि असली ने उनका अभ्‍यास नहीं किया है, नकली ने उनका अभ्‍यास किया है।
इस दुनिया में सत्य की एक अभिव्यक्ति बस एक ही बार होती है, दुबारा नहीं होती। वैसी अभिव्‍यक्ति फिर कभी नहीं होती। नानक जिस ढंग से बोले, बस नानक बोले। अगर कोई व्यक्ति बिल्कुल नानक के ढंग से बोलता हो —— बिल्कुल वैसा का वैसा —— तो समझ लेना कि झूठ है। अगर स्वानुभव से बोलेगा तो फर्क पड़ ही जाएंगे क्योंकि परमात्मा दो व्यक्ति एक जैसे बनाता ही नहीं; परमात्मा की आदत नहीं। परमात्मा मौलिक है। अपने को दोहराता नहीं। कृष्ण को एक बार बनाया। अब अगर तुमको बाजार में कोई मोर — मुकुट धारी और बांसुरी रखे हुए और पीतांबर पहने हुए कृष्ण खड़े मिल जाएं, तो समझ लेना कोई अभिनेता है, रास — लीला कर रहा है। कृष्ण फिर दुबारा नहीं हुए। बुद्ध दुबारा नहीं हुए।
दुबारा यहां कुछ होता ही नहीं। जैसी सुबह आज हुई, फिर कभी न होगी। जो इस क्षण हो रहा है, फिर कभी पुनरुक्त नहीं होगा। प्रत्येक क्षण अद्वितीय है, बेजोड़ है। और प्रत्येक व्यक्ति तो स्वभावत : बेजोड़ है। वैसी तरंग फिर कभी नहीं आती।

ओशो ..का सोवै दिन रैन
🌹🌹🌞🌞💲