ओशो... एस धम्मो सनंतनो, भाग - ९। नमस्कार

समझने की बात है। जीवेषणा मृत्यु के समय बहुत घनी हो जाती है। स्वभावतः। जब जीवन हाथ से छूटने लगता है तो हम जीवन को और कसकर पकड़ना चाहते हैं। जब जीवन हाथ में होता है तब पकड़ने की कोई जरुरत ही नहीं होती है। जो तुम्हारे पास है उसे तुम थोड़े ही पकड़ते हो, जो जाने लगा, उसे तुम पकड़ते हो। जो तुम्हारे पास है ही, तुम पकडो़ या न पकडो़, उसकी कौन चिंता करता है! लेकिन जिस दिन तुम पाते हो छोड़कर जाने लगा, उस दिन तुम पकड़ते हो, उस दिन तुम दीवाने हो जाते। मृत्यु के क्षण में जीवेषणा बहुत गहरी हो जाती है, आत्यंतिक हो जाती है, चरम हो जाती है।

जीवनभर शायद जीवन में बहुत रस न लिया हो, जीवनभर चाहे साधु जैसे कोई जीआ हो, लेकिन मरते क्षण में असली पहचान होती है। मरते क्षण में कसौटी है। मरते वक्त पता चलता है कि इस आदमी की जीवेषणा थी या नहीं। मरते वक्त जो जीवन को बिना पकडे़, प्रसन्न भाव से, जरा भी रोता हुआ नहीं, जरा भी चीखता--पुकारता नहीं, सहजभाव से मृत्यु में लीन हो जाता है, जरा भी शिकायत नहीं, वही समझो कि जीवेषणा से मुक्त हुआ।

मगर जीवेषणा की कसौटी आती तभी है जब मौत आती है। बुढ़ापे में आदमी ज्यादा जीवन में उत्सुक हो जाता है, क्योंकि पैर डगमगाने लगते हैं, मौत करीब आने लगती है। अब तो अगर पकड़कर नहीं रखा जीवन को तो यह गया। तो यह पंछी कभी भी उड़ जाने को तैयार है! तो सब द्वार--दरवाजे आदमी बंद कर लेता है--और थोडी़ देर जी लें। पहले तो जीवन ऐसे लुटाया कि कभी फिकर नहीं की बहुत।

यही आदमी मौत के वक्त चीखेगा--चिल्लाएगा कि और चौबीस घंटे मिल जाते, एक रात और पूर्णिमा का चांद देख लेता, एक रात और कर लेता प्रेम, एक रात और रह लेता अपने प्रियजनों के बीच, एक बार और सूरज ऊग जाता, एक बसंत और देख लेता, एक बार और देखता खिलते फूल, एक बार और सुनता गीत गाते पक्षी--पकड़ता। अब सब जा रहा है, अब नहीं सूझता उसे कि क्या करें; पहले समय काटता था!

ओशो... एस धम्मो सनंतनो, भाग - ९। नमस्कार।

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