यहाँ के दर्शन मात्र से जटिल से जटिल रोग हो जाते हैं ठीक, जानिये अभी।

कानपुर में बालू के बजरंगबली, दर्शन मात्र से दूर होते हैं सभी रोग
कानपुर. शहर से करीब 20 किमी की दूरी पर महाराजपुर थाना अंतर्गत गंगा के किनारे सैकड़ों साल पुराना मंदिर है। जहां बजरंगी की बालू की मूर्ति है। मान्यता है कि गंगा में चाहे जितनी भी बाढ़ क्यों न आ जाए, लेकिन पानी मंदिर की सीढ़ियों के नीचे ही रहता है। इस हनुमान मंदिर में हर साल गुरु पूर्णिमा के दिन मेला लगता है। जहां देश-विदेश से हजारों की संख्या में भक्त आते हैं। यहां की मान्यता है कि जो भी भक्त गुरु पूर्णिमा के दिन गंगा में स्नान ध्यान करने के बाद भगवान बजरंग बली के दर्शन करता है तो उसके जटिल से जटिल रोग दूर हो जाते हैं। मंदिर में एक दीपक सैकड़ों साल से बदस्तूर जल रहा है। मान्यता है कि स्वामी सूरदास ने ये दीपक जलाया था, तब से इसकी ज्योति जल रही है। मंदिर में प्रसाद स्वरुप यहां सिर्फ आम का फल ही चढ़ाया जाता है। इस मंदिर पर पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह गुरु पूर्णिमा के दिन आए थे और उन्हें सत्ता का सुख मिला था। ढोड़ी घाट के बजरंगी के दरबार में आम जनता, नेता और अभिनेता गुरु पूर्णिमा के दिन आकर मन्नतें मांगते हैं। भगवान बजरंगबली अपने द्वार पर आए हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

स्वामी सूरदास ने रखी थी मंदिर की नींव
चार सौ साल पहले एक साधू गंगा के तट पर रुके थे। साधू को दिखाई नहीं देता था, लोग उन्हें सूरदास के नाम से पुकारते थे। मंदिर के पुजारी विकास कुमार ने बताया कि गंगा तट पर स्वामी सूरदास ने तप करना शुरु कर दिया। विकास ने बताया कि तीन साल तप करने के बाद स्वामी सूरदास ने गुरु पूर्णिमा के दिन गंगा से बालू निकाली और बजरंगबली की तीन फीट की मूर्ति बना डाली। स्वामी सूरदास ने गांव वालों की मदद से मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बाद उन्होंने भक्तों से कहा कि वे मूर्ति को स्पर्श न करें। उन्होंने मंदिर में एक देहरी बनवाई और कहा कि देहरी के बाहर से उनका दर्शन करें। तभी से मंदिर का नाम ढोड़ी घाट पड़ गया।

गद्दी संभालने वाले गुरु होते हैं ब्रह्मचारी
विकास ने बताया कि ढोड़ी घाट में विराजे बजरंगबली के मंदिर पर स्वामी सूरदास की मौत के बाद स्वामी आत्मराज महाराज को गद्दी मिली थी। इसके बाद कई गुरुओं ने मंदिर की गद्दी संभाली। विकास ने बताया कि यहां की मान्यता है कि जो भी गुरु इस दुनिया से विदा लेता है, वो अपने शिष्य को गद्दी पर विराजमान करवाता था। मंदिर की गद्दी संभालने वाले गुरु ब्रम्हचारी होते हैं। वो मंदिर परिसर से सिर्फ दिन में एक बार बाहर निकलते हैं। गुरु भोजन नहीं करते और दिनभर में एकबार मात्र फल का आहार लेते हैं। गुरु जब गद्दी पर बैठते हैं तो वे मंदिर परिसर छोड़ कर कहीं नहीं जाते। तबियत खराब होने पर आयुर्वेदिक दवाइयों से स्वयं का इलाज करते हैं। मंदिर में गुरु पूर्णिमा का महत्व ये है कि प्रसाद के रूप में यहां गुरुजी को आम चढ़ाया जाता है। वहीं मंदिर के गुरु जी का स्पर्श भी मना है। भक्त केवल गुरु पूर्णिमा के दिन ही गुरु जी का पैर छू सकते हैं। गुरु दर्शन के बाद भक्त वहां पर पहले गुरुओं के खड़ाऊं के भी दर्शन करते हैं। इसके बाद भक्तों को मंदिर की तरफ से प्रसाद के रूप में मेवा का लड्डू भी दिया जाता है।

जटिल से जटिल रोग हो जाते हैं ठीक
पटेल नगर फत्हपुर निवासी अनूप तिवारी और नौबस्ता निवासी अनिल अवस्थी ने बताया कि इस मंदिर का अपना अलग ही महत्व है। अनिल अवस्थी ने बताया कि वो तीस साल से लगातार हर गुरु पूर्णिमा के दिन ढोड़ी आकर भगवान बजरंगबली के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। इस मंदिर में गुरु पूर्णिमा के दिन हनुमान जी और गुरु जी को प्रसाद के रूप में आम चढ़ाया जाता है। भक्त दर्शन के बाद यहां चल रहे भंडारे का प्रसाद भी ग्रहण करते हैं। भक्तों का मानना है कि सिर्फ बजरंगबली के दर्शन करने से चारपाई पर आया रोगी ठीक होकर अपने पैरों पर चलने लगता है। भक्त शुद्व मन से यहां आकर जो भी मन्नते मांगते हैं, उनकी हर मनोकामना बजरंगबली पूर्ण करते हैं। यहां पहले के गुरुओं के खड़ाऊं भी रखे हैं, भक्त उनका दर्शन करते हैं। यहां ये चौथे गुरु जी हैं जिनका नाम चैतन्य प्रकाश जी महराज है। सबसे पहले सूर्य स्वामी जी ने मंदिर का निर्माण किया था। उसके बाद आत्म प्रकाश जी महराज, फिर कर्ण प्रकाश जी महराज थे।

एक टिप्पणी भेजें

[blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget