अहंकार का अंतिम संस्कार- ahankar ka antim sanskar

अहंकार का अंतिम संस्कार
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मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं यह
पारसियों का मृतकों को कुएं पर रख देना बड़ा
बेहूदा है। यह बंद होना चाहिये। कभी-कभी तो
नई समझ के पारसी भी यह कहते हैं कि यह बंद
होना चाहिये, यह बहुत बुरा है। लेकिन क्यों यह
बुरा है? बुरा इसलिए है कि हम 'उसको' नहीं देख
पाते। वे जो गिद्ध आकर शरीर को खा जाएंगे,
इससे हम 'उसको' नहीं देख पाते। बड़े मजे की बात
है, कि तुम्हारे भीतर वह है और गिद्धों के भीतर
वह नहीं है? अगर तुम्हारे भीतर वह है तो उनके
भीतर भी वह है।
और एक लिहाज से पारसियों की
व्यवस्था सब से ज्यादा संगत है। हिंदू जला देते हैं,
मुसलमान जमीन में दफना देते हैं। पारसी शरीर
को, मरे हुए शरीर को भोजन बना देते हैं। सबसे
ज्यादा संगत, इकोलाजिकल, प्राकृतिक
उनकी ही व्यवस्था मालूम पड़ती है। क्योंकि
जिंदगी भर तुमने भोजन किया। वृक्ष से तुमने फल
तोड़े, पशु-पक्षियों से तुमने मांस लिया,
मुर्गियों से अंडे लिये, जिंदगी भर तुमने न मालूम
कितने जीवन से भोजन इकट्ठा किया! इस
भोजन को जलाने का तुम्हें हक क्या है? इसको,
भोजन को फिर भोजन बन जाने दो ताकि
वर्तुल पूरा हो जाए। ताकि तुमने जो लिया
था, वह वापिस लौट जाए। जिनसे लिया था,
उनमें चला जाए। ताकि वर्तुल बीच में खंडित न
हो। यह जलाना तो बात गलत है। तुमने दूसरों
का अन्न बनाया था, अब तुम दूसरों के लिये
अन्न बन जाओ ताकि यात्रा पूरी हो जाए।
तुमने सबका तो इस तरह व्यवहार किया कि वह
तुम्हारे भोजन हैं, और तुम खुद को इस भांति बचा
रहे हो, जैसे तुम किसी के भोजन नहीं।

जिससे हम पैदा हुए हैं, उसी में हमें लीन हो
जाना है। जहां से हमने पाया है, वहीं हमें वापस
लौटा देना है।
पारसियों की अंतिम संस्कार-विधि
वैज्ञानिक है, प्राकृतिक है। ऐसी विधि
किसी की भी इतनी वैज्ञानिक और
प्राकृतिक नहीं है, चाहे हमें कितनी ही कठोर
मालूम पड़े। लेकिन जब तुम फल तोड़ते हो तब तुम्हें
कठोर नहीं लगता। जब तुम मुर्गी का अंडा खाते
हो तब तुम्हें कठोर नहीं लगता। जब तुम मुर्गी की
गरदन काटते हो तब तुम्हें कठोर नहीं लगता,
लेकिन जब गिद्ध तुम्हारी गरदन पर बैठते हैं, तब
तुम्हें कठोर लगता है। तो तुम अपने को बड़ा
विशिष्ट समझ रहे हो! सारे पशु जीते हैं, मरते हैं,
खो जाते हैं; आदमी अंतिम संस्कार करता है।
अहंकार की हद्द है। अहंकार जीते जी भी अपने
को विशेष मानता है, मरकर भी विशेष मानता
है। जब तुम मर गये तब कुछ भी न बचा। खाली देह
पड़ी रह गई। उस खाली देह में तुम जरा भी नहीं
हो, लेकिन अब भी तुम्हारे चारों तरफ संगमरमर
के चबूतरे खड़े किये जाएंगे, उन पर नाम खोदे
जाएंगे। वह जो बचा ही नहीं, उसको भी
सम्हालने की कोशिश की जाएगी।
अहंकार मरकर भी अपनी सुरक्षा करने
की कोशिश करता है।

ओशो न्यूजलेटर से साभार.....

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