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क्या इस कलियुग में भी कोई प्रभु को उपलब्ध हो सकता है?

कलियुग सदा से है–वैसे ही जैसे सतयुग भी सदा से है। सतयुग में राम थे, रावण भी था। रावण को भूल मत जाना। रावण तो सतयुग में नहीं हो सकता; साथ-साथ थे दोनों। रावण कलियुग में था, राम सतयुग में थे।

सतयुग और कलियुग एक-दूसरे के पीछे पंक्ति में नहीं खड़े हैं, कि पहले सतयुग आया, फिर कलियुग आया। सतयुग और कलियुग समसामयिक हैं, कंटेंपरेरी हैं–ऐसे ही जैसे रात और दिन साथ-साथ हैं; अंधेरा-उजाला साथ-साथ हैं; बुराई-भलाई साथ-साथ हैं।

तुमने सदा ऐसा ही सुना है कि पहले सतयुग था, अच्छे दिन थे, अब बुरे दिन हैं। वह धारणा मौलिक रूप से गलत है। पहले भी ऐसा था; आज भी वैसा ही है। पहले भी बुरे होने की संभावना थी; आज भी बुरे होने की संभावना है। पहले भी भले होने की संभावना थी; आज भी द्वार बंद नहीं हो गए हैं।

और ध्यान रहे, अधिक लोग तो सदा ही कलियुग में रहे हैं। बुद्ध समझाते हैं लोगों को : “चोरी न करो, बेईमानी न करो,र् ईष्या न करो, मद-मत्सर न करो; हिंसा न करो।’ सुबह से सांझ तक समझाते हैं; चालीस साल ज्ञान की उपलब्धि के बाद यही समझाया। यही और यही। किनको समझाते हैं? सतयुग था? तो जो लोग चोरी करते ही नहीं थे, उनको बुद्ध समझाते हैं चोरी मत करो? जो लोग हिंसा करते ही नहीं थे, उनको बुद्ध समझाते हैं कि हिंसा मत करो? जो लोग ईमानदार थे ही, उनको समझाते हैं कि ईमानदार हो जाओ? तो बुद्ध पागल रहे होंगे। ईमानदारों को कोई नहीं समझाता कि ईमानदार हो जाओ। बेईमानों को समझाना होता है।

महावीर भी वही कर रहे हैं सुबह से सांझ तक। पुरानी से पुरानी किताब वेद भी वही कर रही है। तो वेद के दिन में भी चोर थे, और साधुओं से ज्यादा रहे होंगे; बेईमान थे, और ईमानदारों से ज्यादा रहे होंगे। अगर भले ही लोग होते, शैतानियत होती ही न, तो शास्त्रों की भी कोई जरूरत न थी। शास्त्र किसके लिए लिखे जाते हैं? सद्-उपदेश किसके लिए हैं?

तो मैं तुम्हारी समय की धारणा में एक नया विचार आरोपित करना चाहता हूं: सतयुग सदा है; कलियुग भी सदा है। तुम जो चाहो चुन लो। तुम अभी चाहो तो सतयुग में रह सकते हो। तुम सत् हुए तो सतयुग में प्रविष्ट हो गए। तुम असत् हुए तो कलयुग में प्रविष्ट हो गए। तुमने अंधेरे में दोस्ती बांधी तो कलियुग में रहोगे। और तुमने रोशनी से दोस्ती बांध ली तो सतयुग में रहोगे।

सतयुग और कलियुग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो मरजी हो, उसमें जी लो। कलियुग को दोष मत दो।

आदमी बहुत होशियार है। आदमी कहता है : “हम क्या करें अब, यह तो कलियुग है!’ तुमने समय पर टाल दी बात। तुमने यह कह दिया कि समय ही खराब है; हमारी कोई खराबी नहीं है। तुमने अपनी जुम्मेवारी हटा दी कंधों से। निश्चित ही, अब तुम कलियुग में रहोगे। क्योंकि जिसने अपनी जुम्मेवारी छोड़ दी, उसके जीवन में जागरण की किरण कभी भी न आएगी। और स्वभावतः जब वह अंधेरे ही अंधेरे में जीएगा, तो उसकी धारणा और मजबूत होती जाएगी कि कलियुग बहुत भयंकर है; इससे छुटकारा नहीं हो सकता। और कलियुग तुम्हीं पैदा कर रहे हो।

जिंदगी को बदलो! जिंदगी तुम्हारी है; और कोई जुम्मेवार नहीं। तरकीबें न खेलो। आदमी हमेशा तरकीबें करता है। दोष किसी और पर टाल देता है। दोष दूसरे पर टालकर निश्चित हो जाता है कि अब मेरा तो कोई दोष है नहीं, अब मैं क्या कर सकता हूं, असहाय हूं।

लेकिन जिस दिन तुम असहाय हुए, उसी दिन नपुंसक भी हो जाते हो। जब तुमने कहा, “मैं क्या कर सकता हूं, समय खराब; मैं क्या कर सकता हूं, समाज खराब; मैं क्या कर सकता हूं, चारों तरफ बेईमान ही बेईमान हैं; मुझे भी बेईमान होना ही पड़ेगा, मजबूरी है’ –तो तुम बेईमान हो गए और तुम बेईमान होते चले जाओगे। तुम कमजोर हो जाते हो–उसी दिन, जिस दिन तुम जुम्मेवारी किसी और पर छोड़ते हो। तुम उसी दिन गुलाम हो जाते हो।

मालिक वही है, जिसने कहा : “बुरा हूं तो मैं अपने कारण हूं।’ स्वतंत्र वही है, जिसने कहा : “चोर हूं तो मैं अपने कारण हूं। चोर हूं सही; लेकिन कारण मैं हूं। मैंने चोर होना चुना है।’ यह आदमी साफ-सुथरा है। इस आदमी की जिंदगी में क्रांति हो सकती है। क्योंकि इसके पास क्रांति की मूल कुंजी है। यह कहता है : बुरा हूं तो मैं अपने कारण हूं। अगर अपने कारण बुरा हूं तो जिस दिन चाहूंगा, उस दिन भला हो जाऊंगा। वह दरवाजा मैंने अपने हाथ में रखा है। वह कुंजी अपने हाथ में है।

इसलिए तो इस देश में हम संन्यासी को स्वामी कहते हैं। स्वामी का अर्थ होता है मालिक । मालकियत की घोषणा कि मैं अपना मालिक हूं–बुरा हूं तो, भला हूं तो। मैं जैसा हूं, मैं ही कारणभूत हूं।

इससे घबड़ाओ मत कि मैं कारणभूत हूं। इससे हमें घबड़ाहट लगती है कि मैं अपने अपराधों के लिए जुम्मेवार; मैं अपनी बुराइयों के लिए जुम्मेवार; मैं अपनी शैतानियत के लिए जुम्मेवार! तुम्हें बहुत घबड़ाहट होती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू देखो। इसका दूसरा पहलू यह है कि अगर मैं ही जुम्मेवार हूं तो कुछ किया जा सकता है; तो संभावना रूपांतरण की है, शेष है।

लोग तो टालते ही चले जाते हैं। अब समय पर टाल दिया! समय को कहां पकड़ोगे? कलियुग को तुम कैसे बदलोगे? सतयुग में? तो तुम्हारे तो हाथ के बाहर ही बात हो गयी। तो फिर जो है, ठीक है; इसी में गुजार लेना है–ऐसे ही रोते, ऐसे ही झींकते, ऐसे ही रिरियाते, ऐसे ही सड़कों पर सरकते कीड़े-मकोड़ों की तरह जी लेना है।

मैं तुमसे कहना चाहता हूं : सदा से आदमी की संभावना रही है कि बुरा हो जाए, भला हो जाए। राम के समय में भी सभी लोग भले न थे। अगर सभी लोग भले होते तो राम को कोई अवतार क्यों कहता, कभी सोचा इस बात पर? राम की इतनी प्रतिष्ठा क्यों होती अगर सभी लोग भले होते? उन भले लोगों में राम भी खो गए होते। कौन पूछता! दो कौड़ी की भी बात नहीं थी फिर। जहां सारे भले लोग हों, जहां संतों की जमात हो, वहां कौन राम को पूछता! राम को हम भूल नहीं सके, हजारों साल बीत गए। क्यों नहीं भूल सके? रावणों की भीड़ थी, उसमें राम खूब उभर कर प्रकट हुए। जैसे अंधेरी रात में तारा चमकता है; दिन में तो नहीं चमकता। दिन में भी तारे हैं आकाश में, लेकिन चमकते नहीं। सूरज की रोशनी में सब खो जाते हैं। अंधेरे में चमकते हैं। काले बादल में जब बिजली चमकती है तो बहुत साफ दिखायी पड़ती है।

काले ब्लैक बोर्ड पर हम सफेद खड़िया से लिखते हैं, ताकि दिखायी पड़े। राम अब तक दिखायी पड़ रहे हैं–रावणों का ब्लैक बोर्ड रहा होगा। काले बादल रहे होंगे, इसलिए राम की चमक अभी तक नहीं खोयी है। कृष्ण दिखायी पड़ते हैं; महावीर, बुद्ध दिखायी पड़ते हैं। क्यों? इतना सम्मान किसलिए? यह सम्मान हमने दिया क्यों? यह सम्मान हम न्यून को देते हैं, बिरले को देते हैं, अद्वितीय को देते हैं। यह सम्मान अगर सभी लोग हों एक जैसे, तो फिर नहीं देते।

मैंने सुना है, जब पहला आदमी इलाहाबाद में मैट्रिक पास हुआ था , तो पता है तुम्हें, हाथी पर उसका जुलूस निकला था! सारा इलाहाबाद सजाया गया था। पहला आदमी मैट्रिक पास हो गया! अब मैट्रिक कितने लोग पास हो रहे हैं, कोई गधे पर भी जुलूस नहीं निकालता। अब तुम अगर किसी से कहो कि मैट्रिक पास हूं, तो वह कहता है :”कौन-सी खूबी है! इसमें बताने की क्या बात है?’ मैट्रिक पास कहते वक्त तुमको भी ऐसा छाती बैठती मालूम पड़ेगी कि यह क्या कह रहे हैं।

जमाना था, जब मिडलची कलैक्टर हो जाते थे। उन दिनों कोई मैट्रिक पास हो जाता था तो दुदुंभि पिट जाती थी कि कोई गजब का काम हो गया।

राम की दुदुंभी अभी तक पिट रही है और हमने उनको मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा –पुरुषों में उत्तम मर्यादावाले। लोग अमर्याद रहे होंगे। लोग बड़े हीन रहे होंगे। नहीं तो कैसे राम को तौलोगे? किस कारण विशिष्टता दोगे?

कोहेनूर की प्रतिष्ठा है; कंकड़ों की तो नहीं; कांच के टुकड़ों की तो नहीं। अगर कोहेनूर सड़कों पर पड़े हों, गली-कूचे हर जगह पड़े हों, बच्चे उनसे खेल रहे हों, राह पर ढेर लगे हों, सीमेंट में मिलाकर मकान बनाए जा रहे हों–फिर कोहेनूर इंगलैंड की महारानी रखे बैठी रहे, क्या मूल्य है? मूल्य होता है बिरले का।

राम को हम भूले नहीं। अब्राहम को हम भूले नहीं। मोज़िज़ को हम भूले नहीं। क्राइस्ट को हम भूले नहीं। मोहम्मद को हम भूले नहीं। कारण क्या है? आखिर ये लोग टंगे क्यों रह गए हमारी स्मृति में? बड़ी अंधेरी रात थी। उस अंधेरी रात में चमकते हुए तारे भूलें भी कैसे!
ओशो

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