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राधा जी जन्म कथा....सभी को हार्दिक शुभकामना । राधाअष्ठमी जन्मआष्ट्मी janmashtami radhaa ashtami

admin - 10:38:00 pm

राधा जी जन्म कथा....सभी को हार्दिक शुभकामना ।


धार्मिक कथाओं के अनुसार, आज से पांच हजार दो सौ वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन कस्बे के निकट "रावल गांव" में वृषभानु एवं कीर्तिदा की पुत्री के रूप में राधा रानी ने जन्म लिया था। राधा रानी के जन्म के संबंध में यह कहा जाता है कि राधा जी माता के पेट से पैदा नहीं हुई थी उनकी माता ने अपने गर्भ में "वायु" को धारण कर रखा था उसने योग माया कि प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया.
परन्तु वहाँ स्वेच्छा से श्री राधा प्रकट हो गई.
श्री राधा रानी जी कलिंदजा कूलवर्ती निकुंज प्रदेश के एक सुन्दर मंदिर में अवतीर्ण हुई उस समय भाद्र पद का महीना था, शुक्ल पक्ष
की अष्टमी तिथि, अनुराधा नक्षत्र, मध्यान्ह काल १२ बजे और सोमवार का दिन था. उस समय राधा जी के जन्म पर नदियों का जल पवित्र हो गया सम्पूर्ण दिशाए प्रसन्न निर्मल हो उठी.
वृषभानु और कीर्तिदा ने पुत्री के कल्याण की कामना से आनंददायिनी दो लाख उत्तम गौए ब्राह्मणों को दान में दी.
ऐसा भी कहा जाता है कि एक दिन जब वृषभानु जी जब एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे, तब उन्हें एक बालिका "कमल के फूल" पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया।
राधा रानी जी आयु में श्रीकृष्ण से ग्यारह माह बडी थीं. लेकिन श्री वृषभानु जी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने प्राकट्य से ही अपनी आँखे नहीं खोली है. इस बात से उन्हें बड़ा दुःख हुआ कुछ समय पश्चात जब नन्द महाराज कि पत्नी यशोदा जी गोकुल से अपने लाडले के साथ वृषभानु जी के घर आती है तब वृषभानु जी और कीर्ति जी उनका स्वागत करती है
यशोदा जी कान्हा को गोद में लिए
राधा जी के पास आती है. और जैसे ही श्री कृष्ण और राधा आमने-सामने आते है . तब राधा जी पहली बार अपनी आँखे खोलती है. अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए , वे एक टक कृष्ण जी को देखती है, अपनी प्राण प्रिय को अपने सामने एक सुन्दर-सी बालिका के रूप में देखकर कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते है. जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओ के लिए भी दुर्लभ है तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मो तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे ही श्री राधिका जी जब वृषभानु के यहाँ साकार रूप से प्रकट हुई. और गोप ललनाएँ जब उनका पालन करने लगी. स्वर्ण जडित और सुन्दर रत्नों से रचित चंदन चर्चित पालने में सखी जनो द्वारा नित्य झुलाई जाती हुई श्री राधा प्रतिदिन शुक्ल पक्ष के
चंद्रमा की कला की भांति बढ़ने लगी....
श्री राधा क्या है? :- रास की रंग
स्थली को प्रकाशित करने वाली चन्द्रिका, वृषभानुमंदिर की दीपावली गोलोक चूड़ामणि श्री कृष्ण की हारावली है. हमारा उन परम शक्ति को सत्-सत् नमन है.
जय जय श्री राधे.....
सभी भक्तों प्रेमियों को
राधा अष्टमी की हार्दिक बधाई हो । पं विकास दीप शर्मा ।

विद्वान और पंडित लोग कहते हैं जिस समाधि भाषा में भागवत लिखी गई और जब राधाजी का प्रवेश हुआ तो व्यासजी इतने डूब गए कि राधा चरित लिख ही नहीं सके. सच तो यह है कि ये जो पहले श्लोक में वंदना की गई इसमें श्रीकृष्णाय में श्री का अर्थ है कि राधाजी को नमन किया गया.

शुकदेव जी पूर्व जन्म में राधा जी की निकुंज के शुक थे. निकुंज में गोपियों के साथ परमात्मा क्रीडा करते थे, शुकदेव जी सारे दिन श्री राधे-राधे कहते थे. यह सुनकर श्री राधे ने हाथ उठाकर तोते को अपनी ओर बुलाया तोता आकर राधा जी के चरणों कि वंदना करता है. वे उसे उठाकर अपने हाथ में ले लेती है तोता फिर श्री राधे , श्री राधे बोलने लगा. राधा जी ने कहा - कि अब तू राधे-राधे न कहकर कृष्ण-कृष्ण कह- राधेतिमा वद –कृष्ण कृष्ण बोल. इस प्रकार राधा जी तोते को समझा रही थी.

उसी समय कृष्ण वहाँ आ जाते है राधा जी ने उनसे कहा - कि ये तोता कितना मधुर बोलता है ओर उसे ठाकुर जी के हाथ में दे दिया. इस प्रकार श्री राधा जी ने शुकदेव जी का ब्रह्म के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध कराया. इसलिए शुकदेव जी कि सद्गुरु श्री राधा जी है और सद्गुरु होने के कारण भागवत में राधा जी का नाम नहीं लिया शुकदेव जी ने अपने मुख से राधा अर्थात अपने गुरु का नाम नहीं लिया,। पंडित विकास दीप मंशापूर्ण ज्योतिष शिवपुरी

और दूसरा कारण राधा शब्द भागवत में ना आने का कारण है कि जब शुकदेव जी यदि राधा शब्द ले भी लेते तो वे उसी पल राधा जी के भाव में इतने डूब जाते कि पता नहीं कितने दिनों तक उस भाव से बाहर ही नहीं आ पाते ऐसे में राजा परीक्षित के पास तो केवल सात दिन ही थे फिर भागवत कि कथा कैसे पूरी होती.

जब राधाजी से कृष्णजी ने पूछा कि इस साहित्य में तुम्हारी क्या भूमिका होगी. तो राधाजी ने कहा मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए मैं तो आपके पीछे हूं. इसलिए कहा गया कि कृष्ण देह हैं तो राधा आत्मा हैं. कृष्ण शब्द हैं तो राधा अर्थ हैं, कृष्ण गीत हैं तो राधा संगीत हैं, कृष्ण वंशी हैं तो राधा स्वर हैं, कृष्ण समुद्र है तो राधा तरंग हैं और कृष्ण फूल हैं तो राधा उसकी सुगंध हैं.
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इसलिए राधाजी इसमें अदृश्य रही हैं. राधा कहीं दिखती नही है इसलिए राधाजी को इस रूप में नमन किया. जब हम दसवें, ग्यारहवें स्कंध में पहुंचेंगे, पांचवें, छठे, सातवें दिन तब हम राधाजी को याद करेंगे. पर एक बार बड़े भाव से स्मरण करें राधे-राधे. ऐसा बार-बार बोलते रहिएगा राधा-राधा आप बोलें और अगर आप उल्टा भी बोलें तो वह धारा हो जाता है और धारा को अंग्रेजी में बोलते हैं करंट. भागवत का करंट ही राधा है. आपके भीतर संचार भाव जाग जाए वह राधा है.
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जिस दिन आंख बंद करके आप अपने चित्त को शांत कर लें उस शांत स्थिति का नाम राधा है. यदि आप बहुत अशांत हो अपने जीवन में तो मन में राधे-राधे..... बोलिए आप पंद्रह मिनट में शांत हो जाएंगे क्योंकि राधा नाम में वह शक्ति है. भगवान ने अपनी सारी संचारी शक्ति राधा नाम में डाल दी. इसलिए भागवत में राधा शब्द हो या न हो राधाजी अवश्य विराजी हुई हैं.|