शिवपुरी की बदहाली पर एक रचना

कैसी है बेहाल शिवपुरी
कितनी ये बदहाल शिवपुरी
तिल तिल करके टूट रही है
उलटी चलती चाल शिवपुरी

गांवों से भी जर्जर सड़कें
गड्ढों से घायल हो तड़पें
जगह जगह मिट्टी की ढेरी
हाये ये किस्मत अँधेरी

सीवर को लाया ही क्यों था
ये गाना गाया ही क्यों था
नेताओं की ये मक्कारी
बनी शिवपुरी की दुश्वारी

सिंध का पानी आ न पाया
किसने जाने क्या क्या खाया
जनता प्यासी तड़प रही है
दर दर आका भटक रही है

बिजली की तो बात निराली
चाबीघर की झोली खाली
मनमर्जी से काट रहे हैं
चाहे जो बिल बाँट रहे हैं

बात करें क़ानूनी कुछ हम
अपराधों से निकला है दम
कौई नहीं डरता खाकी से
सबका परिचय नेताजी से

ट्रैफिक के कुछ लट्टू चमकें
धवल सिपाही इत उत दमकें
कोई भी घुस जाये कैसे
आँखों पर पट्टी हो जैसे

बाबू अफसर चिर निद्रा में
सारे हल्के हैं तन्द्रा में
जनता किसका द्वार बजाए
कैसे अपने काम कराये

रोटी पानी घर का सपना
कोई नहीं जनता का अपना
सब्जबाग में होती खेती
गर्दन बस जनता की रेती

कालिज कोई खुल न पाया
उद्योगों की थाह नहीं है
केवल कोरे झूठे वादे
कुछ करने की चाह नहीं है

तहसीलों से ज्यादा बदतर
नर्क बना है अपना ये घर
धूल धूसरित गन्दा संदा
लगता है फांसी का फंदा

चाँद सितारों की दुनिया में
लगे हड्डपा जैसी नगरी
जो विकास की बाट जोहती
छलकी जाती अध जल गगरी

क्यों हमको दी है ये जिल्लत
तिल तिल जीना हर पल किल्लत
क्यों सत्ता का ऐसा दोहन
क्यों कीटों सा अपना जीवन

अब तो तुम सुन लो नेताओं
जनता हक ये मांग रही है
हर हरकत और राजनीति ये
अपने दिल से जान रही है

जनता सड़कों पर है देखो
बिगुल बज चुका परिवर्तन का
तुम भी अपनी आँखें खोलो
वक़्त नहीं ये निज वर्धन का

इससे पहले टूटे संयम
थामो तुम लहराता परचम
जनता के आंसू को पोंछो
ले लो उसका थोड़ा सा गम

वरना ऐसा पल आएगा
सारा गुलशन जल जायेगा
अभी समय पर हाथ बढ़ाओ
वरना फिर पाछे पछताओ।।

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