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2 दो और 4 चार लाइन शायरी Do Or Chaar Line Touching Shayari


कहीं मेरी जान ना ले ले ये पहली शाम दिसंबर
की..
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मुझे मालूम है मैं उस के बिना ज़ी नहीं सकता...
उस का भी यही हाल है मगर किसी और के लिए !
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वो याद आया कुछ यूँ, कि लौट आए सब
सिलसिले....
ठन्डी हवा, पीले पत्ते और नवम्बर के ये दिन
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हिचकियों पर हिचकियाँ मैं रातभर भरता रहा,
वो सो रहा था तो फिर मुझे कौन याद करता
रहा.. ?
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सर-ऐ-आम ये शिकायत है ज़िन्दगी से,
क्यूँ मिलता नहीं मिजाज मेरा किसी से...
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बचपन की नींद अब बहुत याद आती है....
सिर्फ़ मुहब्बत पर ये इलजाम ठीक नहीं
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जाते वक़्त उसने बड़े गुरुर से कहा था ,"तुम जैसे हज़ार
मिलेंगे !
मैंने मुस्कराकर कहा, मुझ जैसे की ही तलाश क्यों
.. ?
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कुछ हार गयी तकदीर कुछ टूट गए सपने..
कुछ गैरों ने बर्बाद किया कुछ छोड़ गए अपने
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बस यहीं काम हैं...फ़ुर्सत भी बोहोत हैं...
तुम हमारे...हम तुम्हारे...ऐब ढुंढते हैं...
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वो शख्स...शायद...मुझी को सोच रहा होगा...
आंखों में ये गुलाब...वरना कहां से आए...
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हलकी हलकी सी सर्द हवा,,,
ज़रा ज़रा सा दर्द ए दिल,,,
अंदाज अच्छा है ए नवम्बर तेरे आने का,,
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लाजवाब कर देतें हैं...तेरे खयाल...दिल को...
मोहोब्बत...तुझसे अच्छा...तेरा तसव्वुर हैं...
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ये किसका खयाल...कौनसी खुशबु...सता रहीं हैं
दिल को...
ये जो करार दिल में हैं...कहीं...ये मोहोब्बत तो
नहीं..
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बस यूँ ही लिखता हूँ .. वजह क्या होगी ..??
राहत ज़रा सी ..
आदत ज़रा सी ..!
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अब से पहले के जो क़ातिल थे बहुत अच्छे थे
कत्ल से पहले वो पानी तो पिला देते थे
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कोशिश ज़रा सी करता तो मिल ही जाता मैं ....
उसने मगर अपनी आँखों में ..... ढूँढा नहीं मुझे
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पूछा था हाल उन्हॊने बड़ी मुद्दतों के बाद...
कुछ गिर गया है आँख में...कह कर हम रो पड़े...
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मेरे सीने से लिपटे होते हैं आज भी एहसास तेरे,
जैसे लिखावट कोई लिपटी हो किताबी पन्नो से
।।
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एक ही चौखट पे सर झुके
तो सुकून मिलता है
भटक जाते हैं वो लोग
जिनके हजारों खुदा होते हैं!
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बुलंदियों की ख्वाइशें तो बहुत है मगर,
दूसरों को रौंदने का हुनर कहाँ से लायें ...
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गर मिल जाती दो दिन कि बादशाहत हमें,
तो मेरे शहर में तेरी तश्वीर का सिक्का चलता..!
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तेरे एक इशारे पे, हम इल्जाम अपने नाम ले लेते
बेवजह, झूठे इल्जाम लगाने की जरुरत क्या थी ?
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मैं भी तनहा हूँ खुदा भी तनहा,
वक़्त कुछ साथ गुज़ारा जाए ...
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ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गए,
इतना तो हुआ, कुछ लोग पहचाने गए,,
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होश मुझे भी आ ही जायेगा मगर ,
पहले ! दिल तेरी याद से रिहा तो हो,,,,
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जो तुम बोलो बिखर जाऐंगे, जो तुम चाहो संवर
जाऐंगे,
मगर ये टूटना-जुड़ना हमें तकलीफ बहुत देता है ,,,
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जो पूरा न हो सका.. वो किस्सा हूँ मै...
छूटा हुआ ही सही.. तेरा हिस्सा हूँ मै..!!
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उसकी आँखों में नज़र आता है सारा जहां मुझ को
.........
अफ़सोस कि उन आँखों में कभी खुद को नहीं देखा
.......!!!
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सुलझा हुआ सा समझते है मुझ को लोग.....
उलझा हुआ सा मुझमे, कोई दूसरा भी है....!!
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हम से बेवफाई की इन्तहां क्या पूछते हो
दोस्तों.......
वो हम से प्यार सीखती रही किसी और के लिए
....!!
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अब उसे न सोचू तो जिस्म टूटने सा लगता है........
एक वक़्त गुजरा है उसके नाम का नशा
करते~करते......!
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तन्हाई तो साथी है अपनी जिन्दगी के हर एक पल
की ........
चलो ये शिकवा भी दूर हुआ कि किसी ने साथ
नहीं दिया .....!!
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परिन्दों को नहीं दी जाती तालीम उड़ानों की..
वो खुद ही तय करते हैं मंजिल आसमानों की..
रखते हैं जो होसला आसमां को छूने का..
उनको नहीं होती परवाह गिर जाने की..!!!
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बच्चा था भूखा और आँखों में अश्क जरुर था
उस फरिश्ते का करिश्मा भी एक फितूर था ..
गोद में बसी माया ने उस भूख को भुला दिया
माँ की लोरी के जादू ने उसे फिर से सुला दिया..!!!
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कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न
हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो...
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उस रात गरीब माँ ने यह कह के बच्चों को सुला
दिया,
फ़रिश्ते ख्वाब में आते है रोटियां ले कर !!!
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जरूरत और चाहत में बहुत फ़र्क है ....कमबख्त़ इसमे
तालमेल बिठाते बिठाते ज़िन्दगी गुज़र जाती है !!!!
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मेरे खुदा ले चल ऐसे मंजर पर मेरे कदम,
जहां न कुछ पाने की खुशी हो, न कुछ खोने का गम
........
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कभी मुस्कुराती आँखें भी कर देती हैं, कई दर्द बयां,
हर बात को रोकर ही बताना जरूरी तो नहीं ......
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मेरे ज़मीर को इस क़दर निचोड़ा ना करो,
हर मुसलमान को दहशतगर्द से जोड़ा ना करो
हम ने भी गंवाई हैं जाने आजादी के लिए,
तुम हमें शक की नज़र से देखा ना करो
हिन्दू हो,मुसलमान हो,सिख हो के इसाई हो सब
एक हैं
तुम हमें मज़हब के तराजू में तोला ना करो
देख कर मासूमों की लाशों को जितना तुम रोए
थे,उतना हम भी रोए हैं
तुम हमें हैवानियत की जात से जोड़ा ना करो
ज़रा देखो उस लाचार माँ बीबी और बच्चे को,
मासूमों की लाशों पर सि यासात की चादर को
लपेटा न करो
वतन के बानी हो अगर ,तो एकता पर विश्वास
करो,
मज़हब के नाम पर वोटों को बटोरा न करो
जो करे वतन से गद्दारी वो इंसान नहीं शैतान है ,
तुम मेरे पाक मज़हब को इस शैतानियत से जोड़ा न
करो.
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मैं तोड़ लेता अगर वो गुलाब होती
मैं देख लेता अगर वो ख्वाब होती
सब जानते है मैं नशा नहीं करता
मगर फिर भी पी लेता अगर वो शराब होती,..
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जानवर की कोख से जनते न देखा आदमी ...
आदमी की नस्ल फिर क्यों जानवर होने लगी
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ग़ैरों से पूछती है
तरीका निजात का
अपनों कि साजिशों से
परेशान ज़िन्दगी ............
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कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा
आँखों को देखा पर दिल मे उतर कर नहीं देखा,
पत्थर समझते है मेरे चाहने वाले मुझे ,
हम तो मोम है किसी ने छूकर नहीं देखा.
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चल रहे है जमाने में रिश्वतो के सिलसिले ........
तुम भी कुछ ले~दे कर, मुझसे मोहब्बत कर लो.....!!!!
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चाँद के दीदार में तुम छत पर क्या चली आई, शहर में
ईद की तारीख मुक्कमल हो गयी.
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आँख उठाकर भी न देखूँ, जिससे मेरा दिल न मिले,
जबरन सबसे हाथ मिलाना, मेरे बस की बात
नहीं !!!!!
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ज़िन्दगी तस्वीर भी है और तकदीर भी!
फर्क तो रंगों का है!
मनचाहे रंगों से बने तो तस्वीर;
और अनजाने रंगों से बने तो तकदीर!!!
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लोग इश्क़ करते है बड़े शोर के साथ,
हमने भी किया था बड़े ज़ोर के साथ,
मगर अब करेंगे ज़रा गौर के साथ,
क्योकि कल देखा था उसे किसी और के साथ!
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ज़ख़्म जब मेरे सिने के भर जाएँगे,
आँसू भी मोती बनकर बिखर जाएँगे,
ये मत पूछना किस किस ने धोखा दिया,
वरना कुछ अपनो के चेहरे उतर जाएँगे!!
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''कहने वालों का कुछ नहीं जाता,
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढें जवाब दर्दों के,
लोग तो बस सवाल करते हैं'
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मेरी तकदीर को बदल देंगे मेरे बुलंद इरादे,
मेरी किस्मत नहीं मोहताज मेरे हाँथों की लकीरों
की !!!
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"नज़र-नज़र में उतरना कमाल होता है ,
नफ़स-नफ़स में बिखरना कमाल होता है
बुलंदियों पे पहुंचना कोई कमाल नहीं ,
बुलंदियों पे ठहरना कमाल होता है ......"
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पंख ही काफ़ी नहीं हैं आसमानों के लिए;
हौसला भी चाहिए ऊंची उड़ानों के लिए!!
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प्यार ने क्या-क्या गज़ब कर दिया, किसी का
नाम कविता किसी को ग़ज़ल कर दिया,
जो एक फूल का वज़न भी उठा न सकी,उस मुमताज
के सीने पर ताजमहल रख दिया!!
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खुदा ने तो मुझे,अपने जैसा ही बना के भेजा था,
ज़माने ने मुझे,ना जाने क्या-क्या पढ़ा दिया ...!
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चुपके से हम ने भेजा था एक गुलाब उसे..
खुशबू ने सारे शहर मैं तमाशा बना दिया..!!
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तकदीर के लिखे पर कभी शिकवा न कर,
तू अभी इतना समझदार नहीं हुआ है की रब के इरादे
समझ सके..
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यूँ ही रखते रहे बचपन से दिल साफ़ हम अपना,
पता नहीं था कि कीमत तो चेहरों कि होती है
दिल कि नहीं!!
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"लगी है प्यास चलो रेत निचोड़ी जाए ,
अपने हिस्से में समंदर नहीं आने वाला......!"
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"मौत से बचने की एक तरकीब है ,
दूसरों के ज़ेहन में जिंदा रहो......!"
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अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम
अक़सर...
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है....
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घर उसने क्या बनाया मस्जिद के सामने।
चाहत ने उसकी हमें नमाजी बना दिया।।
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जाहिर नहीँ करता पर मैँ
रोज रोता हुँ
शहर का दरिया मेरे घर से
निकलता है,
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समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया
ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया....
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तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है
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बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है
वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ
वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है
यहाँ कोठी है बंगले है और कार है
वहां परिवार है और संस्कार है
यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है
यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ,
यहाँ रात को बहार निकलने में दहशत है
मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है,
वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है
चल आज हम उसी गाँव में चलते है
............. उसी गाँव में चलते है |
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समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया
ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया....
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ज़िंदगी जीने को एक यहाँ ख्वाब मिलता है,
यहाँ हर सवाल क! झूठा जवाब मिलता है,
किसे समझे अपना किसे पराया,
यहाँ हर चेहरे पे एक नकाब मिलता है.
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लगे है फोन जबसे, तार भी नहीं आते,
बूढी आँखों के अब मददगार भी नहीं आते,
गए है जबसे शहर में कमाने को लड़के ,
हमारे गाँव में त्यौहार भी नहीं आते।
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वो मुझे मेहंदी लगे हाथ दिखा कर रोई, मैं किसी
और की हूँ बस इतना बता के रोई!
शायद उम्र भर की जुदाई का ख्याल आया था उसे,
वो मुझे पास अपने बैठा के रोई !
कभी कहती थी की मैं न जी पाऊँगी बिन तुम्हारे,
और आज ये बात दोहरा के रोई!
मुझसे ज्यादा बिछड़ने का ग़म था उसे, वक़्त-ए -
रुखसत वो मुझे सीने से लगा के रोई!
मैं बेक़सूर हूँ कुदरत का फैसला है ये, लिपट कर मुझे बस
इतना बता के रोई।
मुझ पर दुःख का पहाड़ एक और टूटा, जब मेरे सामने
मेरे ख़त जल के रोई।
मैं तन्हा सा खुद में सिमट के रह गया, जब वो पुराने
किस्से सुना के रोई।
मेरी नफ़रत और अदावत पिघल गई एक पल में, वो
वेबफ़ा थी तो क्यों मुझे रुला के रोई।
सब गिले-शिकबे मेरे एक पल में बदल गए, झील सी
आँखों में जब आँसू के रोई।
कैसे उसकी मोहब्बत पर शक़ करूँ मैं, भरी महफ़िल में
वो मुझे गले लगा के रोई !....
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रूह के रिश्तों की ये गहराइयाँ तो देखिये,
चोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ।
चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जायें दोस्तों,
जब मुसीबत सर पे आ जाए, तो याद आती है माँ।
हो नही सकता कभी एहसान है उसका अदा,
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ।
मरते दम बच्चा अगर आ पाये न परदेस से,
अपनी दोनो पुतलियाँ चौखट पे धर जाती है माँ।
प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज है,
ये तो उन बच्चों से पूँछो, जिनकी मर जाती है माँ।
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दिल से मिले दिल तो सजा देते है लोग,
प्यार के जजबातो को डुबा देते है लोग,
दो इँसानो को मिलते कैसे देख सकते है,
जब साथ बैठे दो परिन्दो को भी उठा देते है लोग।
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"चाँद का क्या कसूर अगर रात बेवफा निकली,
कुछ पल ठहरी और फिर चल निकली,
उन से क्या कहे वो तो सच्चे थे,
शायद हमारी तकदीर ही हमसे खफा निकली."
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ये कह कह के हम दिल को समझा रहे है
वो अब चल चुके,वो अब आ रहे है..
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समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया,
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया.
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आजकल सवाल ही सवाल खिलते हैं,फूलों की तरह,
जवाब गुम-सुम से मिट्टी में,दबे रहते हैं..
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चंद सवालॊं की तल़ब़गार है जिंदगी ।
थॊड़ी तॆरी थॊड़ी मॆरी उधार है जिंदगी ||
हवाओं कॆ थपॆड़ॆं सह चुकी है।
अब तुफानॊं सॆ दॊ चार है जिंदगी ||
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फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया
ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ।।
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बड़ी अजीब चीज है ये मौत भी,
कभी कभी उस जगह भी मिल जाती है....
जहाँ लोग जिंदगी की दुआ मांगने जाया करते
है....... }
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आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,
मस्जिद में भजन, मंदिरों में अज़ान हो.
खून का रंग फिर एक जैसा हो,
तुम मनाओ दिवाली ,मैं कहूं रमजान हो.
तेरे घर भगवान की पूजा हो,
मेरे घर भी रखी एक कुरान हो.
तुम सुनाओ छन्द 'निराला' के,
यहाँ 'ग़ालिब' से मेरी पहचान हो.
हिंदी की कलम तुम्हारी हो,
यहाँ उर्दू मेरी जुबान हो.
बस एक बात तुझमे मुझमे वतन की खातिर यहाँ
समान हो,
मैं तिरंगे को बलिदान दूँ, तुम तिरंगे पे कुर्बान हो.
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कोई गुजराती बचा लाया;
कोई बिहारी बचा लाया;
कोई तेलुगुओं के लिए हाहाकार करने लगा;
इसी गहमा-गहमी में हिन्दुस्तानी बह गया!
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अपने मतलब के अलावा कौन किसी को पूछता है,
बिना रूह के तो घर वाले मय्यत को भी नहीं रखते.
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"शायरी छोड़ दी तो भूलने लगी दुनिया,
जब लिखते थे शायरी तो एक नाम था अपना "..
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हर इक हसरत हंस कर उनकी पूरी की हमने,
हमारी एक तमन्ना उनके दिल को भारी कर गयी.
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यूँ तो काफी मिर्च-मसाले हैं इस जिंदगी में....
तुम्हारे बिना जायका फिर भी फीका ही लगता
है....
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चूम कर कफ़न में लपेटे मेरे चेहरे को,
उसने तड़प के कहा...
'नए कपड़े क्या पहन लिए, हमें देखते भी नहीं' !!
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मुझे देखने से पहले साफ़ कर... अपनी आँखों की
पुतलियाँ ग़ालिब...
कहीं ढक ना दे मेरी अच्छाइयों को भी..नज़रों की
ये गन्दगी तेरी...!!!!!!!!
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मुझे दुनिया की ईदोँ से भला क्या वास्ता
यारोँ ????
हमारा चाँद दिख जाऐ हमारी ईद हो जाऐ !!!;)
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ना ख़ुशी की तालाश है ना गमे निजात की आरज़ू ,
मैं खुद से नाराज़ हूँ तेरी बेरुखी के बाद .
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दो चार नही मुझे सिर्फ एक दिखा दो,
वो शख्स जो अन्दर भी बाहर जैसा हो.
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आज़ उदासी ने भी हाथ जोड़ कर कहा मुझसे,
वास्ता तुझे तेरे प्यार का मेरा आशियां छोड़ दे..
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पंखों को खोल कि ज़माना सिर्फ उड़ान देखता है
|
यूँ जमीन पर बैठकर, आसमान क्या देखता है ||
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मुमकिन हुआ तो मै तुम्हे माफ़ करुगा ,
फिलहाल तेरे आंसुओ का मुन्तजिर हूँ मै.
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किसी के आने या जाने से जिँदगी नही रुकती...
बस जीने का अँदाज बदल जाता है..
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बच्चा बोला देख कर,मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को, इतना बड़ा मकान!!
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मेरे सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए..
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अजीब सी आदत और गजब की फितरत है मेरी..
मुहब्बत हो या नफरत बहुत शिद्दत से करता हूँ..
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आज इस कदर याद आ रहे हो..
जिस कदर तुमने भुला रखा है..
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मुफ्त में नहीं आता यह शायरी का हुनर,
इसके बदले ज़िन्दगी हमसे हमारी खुशियों का
सौदा करती है.
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जरा सी बात पर बरसों के याराने गए,, !!!
मगर इतना तो हुआ कि कुछ लोग पहचाने गए,,,
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उस शख़्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं..
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया..
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तुम्हें ये कौन समझाये तुम्हें ये कौन बतलाये..
बहोत खामोश रहने से ताल्लुक टूट जाते हैं..
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ख़्वाब जितने भी थे जल गए सारे..
अब इन आँखों में नमी के सिवा कुछ भी नही..
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तुम हमें मिल जाओ ये मुमकिन नहीं...
हम तुम्हे छोड़ दें ये हमें मंजूर नहीं ..
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गैरों से मुहब्बत होने लगी है आजकल मुझे,
जैसे जैसे अपनों को आजमाता जा रहा हूँ...
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जो गरीबी में एक दिया भी न जला सका
एक अमीर का पटाखा उसका घर जला गया ..
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ज़ख्म क्या होता है ये बताएँगे किसी रोज,
कमाल की ग़ज़ल तुमको सुनाएंगे किसी रोज,
थी उन की जिद के मैं जाऊं उनको मनाने,
मुझे ये वहम था कि वो बुलाएँगे किसी रोज,
मैंने कभी सोचा भी नहीं था ऐसा कि,
मेरे दिल को वो इतना दुखायेंगे किसी रोज,
उड़ने दो इन परिंदों को आजाद फिजाओं में,
गर होंगे तुम्हारे तो लौट के आएंगे किसी रोज..
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सिर्फ चेहरे की उदासी से भर आये आंसू
दिल का आलम तो अभी आपने देखा ही कहा है !!!!
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ऐसा नहीं कि हमको मुहब्बत नहीं मिली,
तुझे चाहते थे, पर तेरी उल्फत नही मिली,
मिलने को तो ज़िंदगी में कईं हमसफ़र मिले,
पर उनकी तबियत से अपनी तबियत नही मिली,
चेहरों में दूसरों के तुझे ढूंढते रहे दर-ब-दर,
सूरत नही मिली, तो कहीं सीरत नही मिली,
बहुत देर से आया था वो मेरे पास यारों,
अल्फाज ढूंढने की भी मोहलत नही मिली,
तुझे गिला था कि तवज्जो न मिली तुझे,
मगर हमको तो खुद अपनी मुहब्बत नही मिली,
हमे तो तेरी हर आदत अच्छी लगी "फ़राज़"
पर अफ़सोस !! तेरी आदत से मेरी आदत नही मिली..
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तेरी मुहब्बत भी उस खुदा के करम की तरह है,
जो जरूरतमंद है, बस उसी को ना मिली...
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वो एक पल जिसे तुम सपना कहते हो,
तुम्हे पाकर मुझे जिंदगी सा लगता है,
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बहुत याद करता है वो मुझे..
दिल से ये वहम जाता क्यों नहीं...
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अजब ज़ुल्म करती हैं तेरी यादें मुझ पर ..
सो जाऊँ तो जगा देती हैं जग जाऊँ तो रुला देती
हैं..
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बताओ ना कैसे भुलाऊँ तुम्हें..
तुम तो वाक़िफ़ हो इस हुनर से..
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शुक्रिया उनका कि हमें जीना सिखा दिया..
होते थे जिन आँखों में समंदर उनको ही सुखा
दिया..
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ताज महल को बनाना तो हमें भी आ गया है अब ..
कोई एक मुठ्ठी वफ़ा अगर ला दे ,तो हम काम शुरू
करें..
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हम तो बेवजह ही करते रहे
रौशनी की तलाश,
रात दिये के सहारे कट सकती थी मालूम
ना था...
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मैं क्यों करूं मुहब्बत किसी से मैं तो गरीब हूँ,
लोग बिकते हैं और खरीदना मेरे बस में नहीं...
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रिस्ते बन जाते है अनजाने मेँ...
पर तकलीफ होती है निभाने मेँ ..,
रूठनेँ बाले तो पल मेँ रूठ जाते है ..
और उमर गुजर जाती है उन्हेँ मनानेँ मेँ..
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ये मुहब्बत भी है क्या रोग फ़राज़,
जिसे भूले वो सदा याद आया...
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सफर मोहब्बत का दुश्वार कितना है..
मगर देखना है कोई वफादार कितना है..
यही सोच कर कभी उसे नहीं माँगा हमने...
उसे आजमाना है की वो मेरा तलबगार कितना है...
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साँसों का टूट जाना तो बहुत छोटी सी बात है
दोस्तोँ ..
जब अपने याद करना छोड़ दें मौत तो उसे कहते हैं ..
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दीप ऐसे बुझे फिर जले ही नहीं ..
ज़ख्म इतने मिले फिर सिले ही नहीं..
व्यर्थ किस्मत पे रोने से क्या फायदा...
सोच लेना की हम तुम मिले ही नहीं ...
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लौट के आ गये शाम के परिंदे भी ..
मेरा वो " सुबह का भूला " अब तक नहीं लौटा..
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नजाकत से मेरी आँखों में वो उसका देखना तौबा..
इलाही हम उन्हें देखें या उनका देखना देखें..
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मेरी हर दुआ हर अजान में तू है ,
कहते है घर खुदा का जिसे उस मकान में तू है ,
कैसे पहुंचेगी मेरी परवाज़ तुझ तक ,
मैं हूँ जमीन पर और आसमान पर तू है..
मेरी इबादत मेरी मोहब्बत पर इनायत कर,
मेरे दिल और धड़कन के दरम्यान में सिर्फ तू है,
मेरी ख़ताएँ नाकाबिले माफ़ी है शायद,
तभी तो बेपरवाह है इस कदर कि मेरे दर्द से अनजान
तू है..
--------------------------------
तू मेरे राम में खुदा का तसव्वुर कर ले....
तेरे खुदा में अपना राम देखता हूँ मैं....
--------------------
चैन मिलता था जिसे आके पनाहों में मेरी,
आज देता है वही अश्क निगाहों में मेरी....
-------------------------
चलो आज बचपन का कोई खेल खेलें,
बड़ी मुद्दत हुई बेवजह हंसकर नहीं देखा..
-----------------------
गुज़र गया वो वक़्त जब तेरी हसरत थी मुझको..
अब तू खुदा भी बन जाए तो भी तेरा सजदा ना
करूँ..
-------------------------
किसी की यादों ने पागल बना रखा है..
कहीं मर ना जाऊं कफ़न सिला रखा है..
जलने से पहले दिल निकाल लेना..
कहीं वो ना जल जाए जो दिल में छुपा रखा है...
-----------------------------
मेरे ज़ज्बात की कदर ही कहाँ..
सिर्फ इलज़ाम लगाना ही उनकी फितरत है..
----------------------
हो सकती है मोहब्बत ज़िंदग़ी मे दोबारा भी..
बस हौसला हो एक दफ़ा फिर बर्बाद होने का..
---------------------------
कोशिशें जब भी करता हूँ "उनको" भुलाने के लिए..
" वो" ख्वाबों में चले आते हैं, मुझको सताने के लिए..
-----------------------------
कतल तो लाजिम है इस बेवफा शहर में...
जिसे देखो हाथ में दिल और दिल में नफरत लिये
फिरता है...
------------------------------------
क्या मिला हमें सदियों कि मोहब्बत से..
एक शायरी का हुनर और दुसरा जागने कि सज़ा..
--------------------------------
महबूब का घर हो या फरिश्तों की ज़मी..
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा...
---------------------------
ज़रा सा बात करने का तरीका सीख लो तुम भी..
इधर तुम बात करते हो उधर दिल टूट जाता है..
---------------------------------
उसका वादा भी बडा अजीब था जिंदगी भर साथ
निभाने का..
मैंने भी ये नहीं पूछा कि मुहब्बत में साथ दोगे या
यादों में ...
--------------------------------
चलते थे इस जहाँ में कभी सीना तान के हम ..
ये कम्बख्त ... इश्क़ ,,,,क्या हुआ घुटनो पे आ गए हम..
----------------------------------
वो कहते हैं अपने दिल के रास्ते पर चलो..
जब दिल ही टूटकर चौराहे पर बिखर जाए तो फिर
किधर जाएं..
--------------------------------
Source : https://www.facebook.com/pages/
Think-different/178986092135354?ref=stream
Posted 18th December 2013 by vivek kumar
18
DEC
शायरी संग्रह # 4
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जब तिरा नाम लिया दिल ने, तो दिल से मेरे
जगमागाती हुई कुछ वस्ल की रातें निकलीं
अपनी पलकों पे सजाये हुए अश्कों के चिराग़
सर झुकाये हुए कुछ हिज्र की शामें गुज़रीं
क़ाफ़िले खो गये फिर दर्द के सहराओं में
दर्द जो तिरी तरह नूर भी है नार भी है
दुश्मने-जाँ भी है, महबूब भी, दिलदार भी है
----------------
जो हुआ वो हुआ किसलिए
हो गया तो गिला किसलिए
काम तो हैं ज़मीं पर बहुत
आसमाँ पर खुदा किसलिए
एक ही थी सुकूँ की जगह
घर में ये आइना किसलिए
----------------
तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती
एक ख़्वाब सा देखा है ताबीर नहीं बनती
बेदर्द मुहब्बत का इतना-सा है अफ़साना
नज़रों से मिली नज़रें मैं हो गया दीवाना
अब दिल के बहलने की तदबीर नहीं बनती
दम भर के लिए मेरी दुनिया में चले आओ
तरसी हुई आँखों को फिर शक्ल दिखा जाओ
मुझसे तो मेरी बिगड़ी तक़दीर नहीं बनती
-----------------------
उसके होंठों पर रही जो, वो हँसी अच्छी लगी
उससे जब नज़रें मिलीं थीं वो घड़ी अच्छी लगी
उसने जब हँसते हुए मुझसे कहा` तुम हो मेरे `
दिन गुलाबी हो गए ,ये ज़िन्दगी अच्छी लगी
पूछते हैं लोग मुझसे , उसमें ऐसा क्या है ख़ास
सच बताऊँ मुझको उसकी सादगी अच्छी लगी
कँपकँपाती उँगलियों से ख़त लिखा उसने `खुमार `
जैसी भी थी वो लिखावट वो बड़ी अच्छी लगी
---------------
भरी है धूप ही धूप
आँखों में
लगता है
सब कुछ उजला उजला
.
.
.
तुम्हें देखे ज़माने हो गए हैं
--------------
Posted 28th July 2013 by vivek kumar
28
JUL
नज्म संग्रह 1
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मैं भी बहूत अजीब हूँ  इतना अजीब हू की बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
---------------
रंग , हर रंग में हैं दाद-ए -तलब
खून थूकू तो वाह वाह कीजिये
---------------
सोचता हु उस की याद आखिर
अब किसे रात भर जगाती  होगी
---------------
तारीख की नज़र में ऐसे भी मंज़र आये
जब लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा
पायी
---------------
साज गए हम लुटे हुए सजिंदा जैसे बैठे है
यार चले गए हम बेशरम जिन्दा जैसे बैठे है
---------------
मैं अब हर शख्स से उकता  चूका हूँ
फ़क़त कुछ दोस्त हैं और दोस्त भी क्या
---------------
उस शक्स में बात ही कुछ ऐसी थी..
हम अगर दिल न देते तो जान चली जाती
---------------
बहूत नज़दीक आते जा रहे हो ,
बिचरने का इरादा कर लिया है क्या
---------------
हमको ग़ालिब ने यह दुया दी थी
तुम सलामत रहो हज्जार बरस
यह बरस तो फ़क़त दिनों में गया
---------------
मुझ से कहती थी वो शराब आंखे
आप वो जहर  मत पिया कीजिये
---------------
इतना खाली था अन्दु -रुन मेरा
कुछ दिन तो खुदा रहा मुझ में
---------------
गुस्सा भी हैं तहजीब-ए -तलाक़ -का तलबगार
हम चुप हैं , भरे बैठे हैं,गुस्सा ना करेंगे
---------------
आग से खेलना है शौक अपना
अब तेरे ख़त जलाये जायेंगे
---------------
सीसे की इस तरफ से , मैं सब को ताक रहा हुईं
मरने की भी किसी में , फुर्सत नही है मुझ में
---------------
याद की धूप  तो हैं रोज की बात हैं
हाँ मुझे चांदनी से खतरा है।
---------------
एक नफरत ही नहीं दुनिया में दर्द का सबब
यह मोहब्बत भी अक्सर सुकून वालों को तबाह कर
देती है
---------------
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता
---------------
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
---------------
लब ये कहते हैं, "चलो अब मुस्कुराया जाये"
सोचती हैं आखे, दिल से दगा केसे किया जाये ?
---------------
बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाओ में कहाँ
वह मज़ा जो भीगी भीगी घास पर सोने में हैं
मुत्मुइन बेफिक्र लोगो की हसीं में कहाँ
लुत्फ़ जो एक दुसरे को देख कर रोने में है
---------------
अपनी पलकें वो बंद रखता है
जाने कैसी पसंद रखता है
धूप से सामना न हो जाए
घर से दरवाज़े बंद रखता है
---------------
आँगन में खिले गुलाब पर जा बैठी
हल्की सी उड़ी थी उनके कदमों से जो धूल
गोरी थी कि अपने बालों में सजाने के लिये
चुपचाप से जाके तोड़ लाई वही फूल
---------------
घर से सिंगार करके जो निकलो कभी, बस यही
तुमसे इक इल्तिजा है मेरी
गाल पर एक तिल भी बनाया करो, जब भी नैनो में
काजल लगाया करो
---------------
बहुत देर तक खामोश रही तुम
बहुत देर तक चुपचाप रहा मैं
बहुत देर तक गूफ्तगू होती रही
---------------
हमने अब तक नहीं कहा उसको
उसने अब तक नहीं कहा हमसे
हम एक दूसरे से प्यार करते हैं
---------------
जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
---------------
इससे बढ़कर मलाल शायरी में क्या होगा
लिखता हूँ जिसके लिए उसको गुमान ही नहीं
समझे मुझे सारा जहाँ तो भी क्या हुआ
गर जज़्बा मेरा जिसके लिए उस पर अयान ही नहीं
---------------------------
बंदगी हमने छोड़ दी 'खुमार '
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ
-------------
वो जान गयी थी ,हमे दर्द में मुस्कराने की आदत हैं
वो रोज नया जख्म देती थी मेरी ख़ुशी के लिए
-----------------
ये जो मेरे दामन पर कजरारे छींटें हैं थोड़े-बहुत
झाँक के देखो,तेरे गिरेबाँ से धूल कुछ उडी लगती है
------------------------------
जुर्म में हम कमी करें भी तो क्यों ...?
तुम सजा भी तो कम नहीं करते ....!
--------------------------
दिल गया तो कोई आँखे भी ले जाता
फकत एक ही तस्वीर कहाँ तक देंखू
----------------------------
दम तोड़ जाती है हर शिकायत लबों पे आकर,
जब मासूमियत से वो कहती है मैंने क्या किया है ?
---------------------------------
"सलीक़ा हो अगर भीगी हुई आँखों को पढने का,
तो फिर बहते हुए आंसू भी अक्सर बात करते हैं"
--------------------------------------
चंद
सिक्को की विडंबना है,
जो खुद
का बच्चा रोता छोङ
मालकिन के
बच्चो को रोज खिलाने
जाती है वो ... ।।।
-----------------------
डरता हूँ कहने से की मोहब्बत है तुम से ......!!
की मेरी जिंदगी बदल देगा तेरा इकरार भी और
इनकार भी ...!!
---------------------------------
मै फिर से निकलूंगा तलाश -ए-जिन्दगी में ....
दुआ करना दोस्तों इस बार किसी से इश्क ना हो
.....!!!!
-----------------------------------
उसके सिवा किसी और को चाहना मेरे बस में नहीं,
उसके सिवा किसी और को चाहना मेरे बस में नहीं,
.
.
.
.
ये दिल उसका है, अपना होता तो बात और थी
----------------------------------
सैर करो तो चमन की, बाज़ारों मे क्या रखा है
कत्ल करो तो निगाहों से, तलवारों मे क्या रखा है
-------------------------------
मैं सांवरा सा लगता भी हूँ तुम्हारे गोरेपन में
मगर मेरे जज्बात की खूबसूरती भी कम नहीं
----------------------------------
ये भी एक तमाशा है इश्क ओ मोहब्बत में
दिल किसी का होता है और बस किसी का चलता
है
----------------------------
रूह तक नीलाम हो जाती है इश्क के बाज़ार में,
इतना आसान नहीं होता किसी को अपना बना
लेना
-----------------------------------
Posted 21st July 2013 by vivek kumar
21
JUL
शायरी संग्रह 3
0 Add a comment
आशिकी एक ऐसा अहसास है, जो दो दिलों के
बीच पनपता है। लेकिन जरूरी नहीं कि आशि़की
का अंजाम इश्क हो। शायरों ने अंजाम-ए-आशि़की
को कई ढंग से कहा है। आइए जानें :
फूल से आशि़की का हुनर सीख ले,
तितलियां ख़ुद रुकेंगी, सदाएं न दे
- बशीर बद्र
आशि़की बेदिली से मुश्किल है,
फिर मुहब्बत उसी से मुश्किल है
- अहमद फ़राज़
हमें कोई ग़म नहीं था, ग़म-ए-आशि़की से पहले,
न थी दुश्मनी किसी से, तेरी दोस्ती से पहले
- शकील बदायुंनी
आशि़की सब्रतलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूं, ख़ून-ए-जिगर होने तक
- ग़ालिब
आग़ाज़-ए-आशि़की का मज़ा आप जानिए,
अंजाम -ए-आशि़की का मज़ा हम से पूछिए
- खुमार बाराबंकवी
अपने ख़ून-ए-वफ़ा से डरता हूं,
आशि़की बंदगी न हो जाए
- अज्ञात
Posted 21st July 2013 by vivek kumar
21
JUL
अंजाम-ए-आशिकी
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तस्वीरों का हमारी जिंदगी में एक अहम रोल है।
शायरों ने भी इसे अपनी शायरी में जगह दी है। कुछ
ऐसी रोशन जगहों में हम इस दफा आपको लिए चलते
हैं।
तेरी सूरत से नहीं मिलती किसी की सूरत हम जहां में
तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं
- जिगर मुरादाबादी
चंद हसीनों के खुतूत, चंद तस्वीरें बुतां बाद मरने के मेरे
घर से ये सामां निकला
- ग़ालिब
जिससे ये तबीयत बड़ी मुश्किल से लगी थी देखा तो
वो तस्वीर हर एक दिल से लगी थी
- अहमद फराज़
अपनी तस्वीर को आंखों से लगाता क्या है इक नज़र
मेरी तरफ़ देख तेरा जाता क्या है
- शाहज़ाद अहमद
दिखाकर वह मुझे तस्वीर मजनूं की, ये कहते हैं कि जो
होते हैं आशिक़, उनकी सूरत ऐसी होती है
- बहादुर शाह ज़फर
नामाबर अपना हवाओं को बनाने वाले,
अब न आएंगे पलट कर कभी जाने वाले
क्या मिलेगा तुझे बिखरे हुए ख्वाबों के सिवा,
रेत पर चांद की तस्वीर बनाने वाले
- क़तील शिफ़ाई
Posted 21st July 2013 by vivek kumar
21
JUL
तस्वीरों पर जरा अर्ज किया हैं
0 Add a comment
हम आदमियत की पहचान मुश्किल वक्त में ही करते हैं।
शायरों ने आदमियत के कई मायने बतलाएं हैं , जो
आदमी की हमारी समझ को बढ़ाते हैं। आइए उन्हें
ज़ज्ब करें:
बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना ,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी ,
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी
- निदा फ़ाज़ली
ख़ुदा को पा गया वाइज़ मगर है ,
ज़रूरत आदमी को आदमी की
- फि़राक़ गोरखपुरी
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे ,
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
- बशीर बद
वक्त रहता नहीं कहीं छुपकर ,
इस की आदत भी आदमी सी है.
- गुलज़ार
आदमी आदमी से मिलता है ,
दिल मगर कम किसी से मिलता है.
- जिगर मुरादाबादी
Posted 21st July 2013 by vivek kumar
21
JUL आदमियत के मायने, शायरों की
जुबानी
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मयखाने में बेपरवाह बैठे जरुर हैं
पर कितना है पीना हम इतने होश में हैं
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रात भर आसमां में हम चाँद ढूढते रहे
चाँद था कि चुपके से मिरे आँगन में उतर आया !!
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एक ही चौखट पे सर झुके
तो सुकून मिलता है
भटक जाते हैं वो लोग
जिनके हजारों खुदा होते हैं --
------------
यह शहर जालिमो का है संभल कर चलना
लोग सीने से लग कर दिल ही निकाल लेते हैं
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---------
ये भी एक तमाशा है इश्क ओ मोहब्बत में
दिल किसी का होता है और बस किसी का
चलता है
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रूह तक नीलाम हो जाती है इश्क के बाज़ार में,
इतना आसान नहीं होता किसी को अपना बना
लेना
-----------------------------------
मैं सांवरा सा लगता भी हूँ तुम्हारे गोरेपन में
मगर मेरे जज्बात की खूबसूरती भी कम नहीं
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मेरी इबाबतो को ऐसे कर कबूल ऐ खुदा
के सजदे में ,मै झुकू तो हर रिश्तों कि जिन्दगी सवर
जाये !
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जिंदगी के राज़ को रहने दो,
अगर है कोई ऐतराज़ तो रहने दो,
पर जब दिल करे हमें याद करने को,
तो उसे ये मत कहना के आज रहने दो
-----------------------------
जिनके मिलते ही ज़िन्दगी में ख़ुशी मिल जाती है
वो लोग जाने क्यों ज़िन्दगी में कम मिला करते हैं।
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ज़ख़्म जब मेरे सिने के भर जाएँगे,
आँसू भी मोती बनकर बिखर जाएँगे,
ये मत पूछना किस किस ने धोखा दिया,
वरना कुछ अपनो के चेहरे उतर जाएँगे
----------------------------
मुझसा कोई जहाँ में नादान भी न हो ,
कर के जो इश्क कहता है नुकसान भी न हो ...!!
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Ankhe ro padhi unka na paigam aaya,
Chale gaye humein akela chhod ke ye kesa
mukam aaya,
Meri tanhai Hansi mujhpe
Aur boli Bata
Aakhir mere siva tere kon kaam aaya…
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Na jane duniya me aisa q hota hai??????? Jo
sabko khushi de wahi q rota hai?????????????
umar bhar jo sath na dy sake?????????
wahi zindagi ka pehla pyar q hota hai????????
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Basti bhi samander bhi beyaban bhi mera hai
AakheN bhi meri khab-e-pareshan bhi mera hai
Jo dubti jati hai wo kashti bhi hai meri
Jo tutta jata hai wo peyman bhi mera hai
Jo hath uthe the wo sabhi hath the mere
Jo chak huaa wo gereban bhi mera hai
Jis ki koi aawaz na pahchan na manzil
Wo qafla be saro saman bhi mera hai
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JI-JAAN KAR BHI WO JAAN NA PAYE.
AAJ TAK MUJHE PAHCHAAN NA PAYE.
KHUD HI KAR LI BEWAFAAI HUMNE.
TAQI UN PAR KOI ILJAAM NA AANE PAYE.
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Mahlo me rahne vale dhanvan nahi hote , phulo
par sone vale bhagvan nahi hote hain, thukra
dete hain log
muhabbat garib samjh kar ap bata o ki kya in
jhopdo me rahne vale insan nahi hote hai
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Zindagi ek abhilasha h. Kya gajav iski
paribhasha h. Zindagi kya h. Na pooncho. Sabar
gyi to dulhan or
bikhar gyi to tamasha h.
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aap bin agar guzara hamara hota, to yu na aaj
aapko pukara hota. hamara dil me sirfaap hi
aap ho,kaash
aapka dil pe bhi haq hamara hota
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ehshas he aapka purskar jo aapko milla, kintu
dushra bhranti hai ye aash, jahar hai. jo
humesha nirash hai.
hum vo nahi jo tere pyar mai row kar gujar dae,
tere parchayi bhi ho to thokar sae mar dae. kar
lo duniya
muthi mai. aaye to wellcome, jaye to bhid kum.
aane vale ko rokna nahi, jane valle ko tokna
nahi.humar
adhikar keval prathana aur dhanywad jo bhi
milla ushke liye. ehshash...kintu not aash.
ahallae kaawa k sijdo
mere shalika dekho,(mere niyam dekho) sange
dar sir par hai, dar par sir nahi humara
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Nahi Sajde Kiye Humne Kabhi Gairon Ki
Chhokhat Par .....
Hume Jiski Zaroorat Ho Khuda Se Maang Lete
Hain .....
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Na dekho kisi ko aisi nazar se,
Ke gir jaao khud apni nazar se,
gaur se dekho kabhi zara us nazar ko,
jo mil nahi paati kisi aisi nazar se.
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sari umr poojte rahe log apn hath se bne pathar
ki murat ko..........hmne khuda ke hath se bni
murat ko caha
to gunahgar ho gyae
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Wo Bewafa Nhi Tha. . . . Yun Badnam Kar Diya
Logon Ney
Un Kay Chahney Waley Hazar Thay. . . . . Wo
Kis Kis Say Wafa Karta
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ek pal gamo ka dariya ek pal khushi ka dariya,
thamta nhi kanhi b ye zindgi ka dariya...
es dil ki wadiyo m ab khak udd rhi h, bahtaa
ynhi tha phle ek aashqui ka dariya...
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loog peyar ke liye hote hai or cije istmal ke liye
baat tab bigadti hai jab cijo se peyar kiya jaye
or logo ko
istmal kiya jaye
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Yaaden teri rakh di hai sambhalkar,
Dur kahi is dil se nikalkar.
Sab kuch to vapas le liya hai aapne dur jaakar,
in yaadon ko bhi le jana kisi roz aakar..
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khuda ko pa gaya waiz magar hai,
zarurat aadmi ko aadmi ki,
mile hun muskura ke us se har bar,
magar aankhon mein bhi thi kuch nami si thi..
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Ek Dil Mere Dil Ko Zakhm De Gaya
Zindagi Bhar Jeene Ki Kasam De Gaya
Lakho Mein Se Ek Phool Chuna Tha Hum Ne
Jo Kanto Se Bhi Gehri Chubhan De Gaya
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Hum hawa nahi jo kho jaenge, Hum waqt nahi
jo guzar jaenge. Hum mausam nahi jo badal
jaenge, Hum to
aansu hain jo khushi aur gham dono me saath
nibhaenge.
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tuta ho dil to dukh hota h,
krke mohabat kisi se y dil rota h,Drd ka ehsas
to tb hota h,
Jb jisse mohabat ho or uske Dil me koi or hota
h.
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Uske Hisse K Sare Gum Mujhe Dey De Ya Rab
Mein Uska Utra Hua Chehra Nhi Dekh Sakta...
Wo Kitne Hi Tukde Kare Mere Dil K
Par Mein Uski Aankhon Me Nami Nhin Dekh
Sakta.
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Ajib lagti he shaam kabhi kabhi
Jindagi lagti he bejaan kabhi kabhi
Samajh aaye to hume bhi batana
Q karti he yaade pareshaan kabhi kabhi
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nekiyaan kar ke ,jo dariya me dal doge abhi...
.
wahi toofaano main ,'kashtiyaan' ban kar saath
dengi kabhi;-
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Apni zindgi se muje hatane chale ho, 1 staey
hue ko stane chale ho, kitne nadan ho tum mere
DOST, jo apne
haton ki lakire mitane chale ho.
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Muddat se door the hum tum,
ek zamane ke baad milna acha laga.
sagar se gehra laga aapka pyar,
tairna to aata tha par doobna acha laga....
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chahati hai ye yaaden kisi ko karib pane ko, jab
dur ho koi to ati hai satane ko, koi nahi sakega
kabhi yadon
ko hatane ko, jitna bhulna chaho utna hi ayega
jatane ko..
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Tanhai na paaye koi kisi ke saath ke baad
Judai na paaye koi milan ke baad
Na pade kisi ko aadat kisi ki itni
Ki har saans bhi aaye kisi ki yaad ke baad.
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Ye rishte pyaar mohhabat ke aajmaye nahi jaate
Agar toot bhi jaayain dil se bhulaye nahi jaate
koi khaas hi hota hai palko main jo rehta hai
har kisi ko dil main basaya nahi jaata
saare sapno ki kiranay to ho jaati hai khud
roshan
khawab pyaar ke soch samjh kar sajaye nahi
jaate
Mit jaata hai sabkuch magar is pyaar ke riste
main
kuch naqash kabhi dil se mitaye nahi jaate
unki judaai hamain bahut tadpati hai
hamari aankhain unke bina har pal ro deti hai
intejaar ke diye ab humse jalaye nahi jaate…
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DHOKA DIYA tha jab tune mujshe ,zindgi se
main naraaz tha,socha ki dil se tujhe nikaal
du,magar
khmbkhat dil bhi tere pass tha....
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Chalo apani chahat nilam karte mohabbat ka
sauda sare aam kare hai sanam tum apane
dukh mere naam kr
do aur hm bhi apani khushiya tere naam karte
hai
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Youn Na Khaich Apni Taraf Mujhe Be-Bas Kr K
K Khud Se Bhi Bichar Jao,Or Tu Bhi Na Mile .
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ki wo hume mile bhi khuda ke darbaar me,
ab tum hi batao dosto,
mohabbat kare ki ibadatt
------------------
Waqt ke mod pe ye kaisa waqt aaya hai,
Zakhm dil ka zuban par aaya hai,
Na rote the kabhi katon ki chubhan se,
Par aaj na jane kyon phulon ki khushbu se
rona aaya hai
29
MAY
शायरी संग्रह 2
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कौन ना  मर जाये इस सादगी पर ऐ खुदा
लड़ते है , और हाथ में तलवार भी नहीं
----------------------------------------------
---
कहाँ नहीं तेरी यादों के हाथ
कहाँ तक कोई दामन बचा के चले
----------------------------------------------
---
पूछ कर मेरा पता बदनामिया मत मोल ले
ख़त किसी फूटपाथ पर रख दे, मुझे मिल जायेगा
----------------------------------------------
---
कल एक बूँद गिरी मेरे आँगन में
कहीं तुमने नहा  के बालो  के झटका तो नहीं था
----------------------------------------------
---
अर्श तक ओस के क़तरों की चमक जाने लगी।
चली ठंडी जो हवा तारों को नींद आने लगी।।
---------------
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिये
पंखडी एक गुलाब की सी हैं।
------------
सिगरेट जला के मैं जो ज़रा मुत्मइन हुआ।
चारों तरफ से उसको बुझाने चली हवा। ।
- मिद्हतुल अख़्तर
सिगरेट, गिलास, चाय का कप और नन्हा लैंप।
सामाने-शौक़ हैं ये बहम मेरी मेज़ पर। ।
-ज़हीर ग़ाज़ीपुरी
-----------------------------
ये हसरत रह गई किस किस मज़े से ज़िंदगी करते।
अगर होता चमन अपना, गुल अपना, बाग़बां अपना।

- मज़हर जाने-जानां
----------------------------------------------
---
ख़ुदा के वास्ते इसको न टोको।
यही एक शहर में क़ातिल रहा हैं। ।
- मज़हर जाने-जानां
----------------------------------------------
---
जान, तुझ पर कुछ एतबार नहीं।
कि ज़िंदगानी का क्या भरोसा हैं। ।
- ख़ान आरज़ू
-----------------------------
किसी के महरमे आबे रवां की याद आई।
हुबाब के जो बराबर कभी हुबाब आया। ।
----------------------------------------------
---
दुपटे को आगे से दुहरा न ओढों।
नुमुदार चीज़ें छुपाने से हासिल। ।
-------------------
अपने हालात का खुद पता नहीं मुझको,
मैंने औरोंसे सुना है के मैं परेशां हूँ आजकल...
----------------------------------------------
---
आज कोई नया जख्म नहीं दिया उसने मुझे ,
कोई पता करो वो ठीक तो है ना
------------------------
उस शक्स में बात ही कुछ ऐसी थी...
हम अगर दिल न देते तो जान चली जाती....
------------
कल, भीड़ में भी .... तुम हमें तन्हा दिखे
अब बोल भी दो, है क्या वजह तन्हाई की ?
-------------
ऐंसे नहीं न सही, वैसे ही सही
बस, एक बार तुम हाँ तो कहो ?
--------------
जमाने भर के एव कम थे ,
जो तुमने जाते जाते ये घाव दे दिया कि तुम अच्छे
नही हो,
---------------
जब वो मिले हमसे अरसे बाद तो उन्होने पूछा हाल
-चाल कैसा है,
तो मैने कहा तुम्हारी चली चाल से मेरा हाल बदल
गया,
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इतनी शिद्दत से वो शख्स मेरी रगो मै उतर गया है,
कि उसे भुलाने कि लिये मुझे मरना होगा,
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मोहब्बत का अजीब दस्तूर देखा,
जो उसकी जीत हो तो हम हार जाये,
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ऐंसे नहीं न सही, वैसे ही सही
बस, एक बार तुम हाँ तो कहो ?
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ए जिन्दगी खत्म कर अब ये यादो के सिलसिले,
मै थक सा गया हू दिल को तसल्लिया देते देते,
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हमसे मत पूछिए जिंदगी के बारे में
अजनबी क्या जाने अजनबी के बारे में
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तुम्हे मोहब्बत करना नहीं आता
मुझे मोहब्बत के सिवा कुछ नहीं आता
ज़िन्दगी जिने के दो ही तरीके है
एक तरीका तुम्हे नहीं आता
एक मुझे नहीं आता ...
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किसी को भुलाने के लिए ना मर जाना तुम..
क्या जाने कौन तुम्हारी राह देख रहा होगा !!
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हम तो रो भी नहीं सकते उसकी याद में
उसने एक बार कहा था
मेरी जान निकल जाएगी
तेरे आंसू गिरने से पहले..
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आँसू की कीमत जो समझ ली उन्होने..
उन्हे भूलकर भी मुस्कुराते रहे हम ..
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चले जायेंगे तुझे तेरे हाल पर छोड़कर
कदर क्या होती है तुझे वक़्त सिख देगा
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फिकर ही हमारी यही थी..
कि कहीं शिकायत ना हो उनको..
कि क़दर उनकी हमने नही की..
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उन्होने हाँ जो कह भी दिया..
क्या पता दुनिया से लड़ना पड़े हमे..!!
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डायरी खोली एक पुराना ख़त मिला
एक नया जख्म फिर ताज़ा हो गया
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हमने भी सोकर देखा हैं नए पुराने सहरो में
पर जैसा भी हो अपने गर का बिस्तर अच्छा लगता
हैं
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ठिकाना कब्र है तेरा, इबादत कुछ तो कर ग़ाफिल,
कहावत है कि खाली हाथ घर जाया नहीं करते..
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फ़िक्र-ऐ -ज़िन्दगी ने थोड़े फासले बड़ा दिए हैं
वरना
सब दोस्त साथ ही थे ,अभी कल की ही तो बात
हैं
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क्या हुआ जो बदल गयी है दुनिया
मैं भी तो बहोत बदल गया हूँ
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मोहब्बतें तो कभी रास न आई हमको
नफरतों के बीच कभी हम रहे ही नहीं
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और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहते और भी हैं , वस्ल की रहत के सिवा
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ग़ालिब -ए-खस्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं
रोये जार जार क्यों ,किये हाय हाय क्यों
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इश्क पर जोर नहीं हैं यह वो आतिश 'ग़ालिब '
के लगाये न लगे और बुझाये न बुझे
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हमको मालूम हैं जन्नत की हकीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को ,'ग़ालिब' यह ख्याल अच्छा
है
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हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम
निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले
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जाहिद,शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता , जहाँ खुद नहीं
-ग़ालिब
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मस्जिद खुद का घर हैं, पीने की जगह नहीं
काफिर के दिल में जा , वहां खुदा नहीं
-इकबाल
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काफिर के दिल से आया हूँ , मैं यह देख कर 'फ़राज़'
खुद मौजूद हैं वहां , पर उसे पता नहीं
-फ़राज़
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आगे आती थी हाल ए दिल पे हसी
अब किसी बात पे नहीं आती
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अब इस से ज्यादा क्या नरमी बरतू
दिल के ज़ख्मो को छुया है तेरे गालों की तरह
.
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने हैं
जाने न जाने गुल ही न जाने , बाग़ तो
सारा  जाने हैं
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हर शख्स दौड़ता हैं यहाँ भीड़ की तरफ
फिर भी चाहता है उसे रास्ता मिले
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मेरे लफ्जों स न कर मेरे किरदार का फैसला
तेरा वजूद मिट जायेगा मेरी हकीक़त ढुँढते ढुँढते
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जो लौट आये तो कुछ कहना मत बस देखना उन्हेब
गौर से
जिन्हें मज़िलों पे जाकर खबर हुयी कि यह रास्ता
कोई और था
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सैर करो तो चमन की, बाज़ारों मे क्या रखा है
कत्ल करो तो निगाहों से, तलवारों मे क्या रखा
है
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बोल, के लब आज़ाद है तेरे: बोल, ज़बान अब तक तेरी
है,
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा – बोल, के जान अब तक
तेरी है.
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कुछ तबियत ही मिली थी ऐसी , चैन से जीने की
सूरत न हुयी
जिसको चाह उसको अपना न सके , जो मिला उस
से मोहब्बत न हुयी
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hamari is duniya me zindagi thami si rehti hai
kabhi aayiyega, but bankar baithenge
Posted 20th April 2013 by
APR

शायरी -ये मेरा इंडिया
किरण चाहू तो दुनिया के सरे अँधेरे घेर लेते है |
कोई मेरे तरह जी ले तो जीना भूल जायेगा ||
साथ भी छोडा तो कब,जब सब बुरे दिन कट गए |
ज़िन्दगी तुने कहा आकर दिया धोखा मुझे ||
हमें इस चिस्त से उम्मीद क्या थी और क्या निकला
|
कहा जाना हुआ था तय कहा से रास्ता निकला ||
खुदा जिनको समझते थे वो शीशा थे न पत्थर थे |
जिसे पत्थर समझते थे वही अपना खुदा निकला ||
जिसने इस दौर के इन्सान किये है पैदा वो मेरा भी
खुदा होगा मुझे मंज़ूर नहीं |
अगर टूटे कीसी का दिल ,तो शब् भर आख रोती है |
ये दुनिया है गुलो की जी इसमें काटे पिरोती है ||
हम मिलते है अपने गाओ में दुश्मन से भी इठला कर |
तुम्हारा शहर देखा तो बड़ी तकलीफ होती है ||
तुम्हारे जैसे हमने देखनेवाले नहीं देखे |
जिगर में किस तरह से रंजो ग़म पाले नहीं देखे ||
यहाँ पर जात मजहब का हवाला सबने देखा है|
किसी ने भी हमारे पाओं के छाले नहीं देखे ||
कदम उठने नहीं पाते, के रास्ता काट देता है|
मेरे मालिक मुझे आखिर तू कब तक आजमाएगा||
मेरी आँखों में आसूं ,तुझसे हम दम क्या कहूं क्या है.
ठहर जाये तो अंगारा है,बह जाये तो
लौट आओ कि मेरी साँसे अब
तिनका तिनका बिखरती
हैं..
कहीं मेरी जान ना ले ले ये
पहली शाम दिसंबर की..

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