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रविवार, 17 मई 2015

सोमवार 18 जून 2015 को है शनि जयन्ती shani maharaj janamdin jayanti 2015

admin - 1:11:00 pm


शनि जयँति और अमावस का ही होना दुलर्भ नहीँ है क्योँकि शनि जयँति तो ज्येष्ठ मास की अमावस्या को ही होती है बल्कि इनका सोमवार  और क्रतिका नक्षत्र मेँ होना इसे दुर्लभ बनाता है |शनि की शाँति का विशेष अवसर है जो शनि की महादशा, अँतर्दशा, साढेसाती , ढैय्या और जन्मकुण्डली मेँ शनि की खराब स्थिति के कारण दुख और कष्ट भोग रहे हैँ।  सोमवार भगवान शंकर जी का दिन है ओर शंकर जी शनिदेव के गुरु है | शनि जयंती का गुरु के वार मे होना शुभ सूचक है |ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि ने मां पार्वती को बताया कि मैं सौ, जन्मों तक जातक की करनी का फल देता हूं। परमात्मा ने शनि को तीनों लोगों का परम न्यायाधीश बनाया है। शनि हमारे अच्छे-बुरे कर्मों का फल देता है। यही कारण है। कि न्यायालयों में इसकी प्रधानता है अर्थात न्यायाधीश का कोट काला होता है। वकीलों का कोट भी काला होता है। काला रंग शनि का है और काले रंग की विशेषता है कि इस पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता। शनि की बड़ी सूक्ष्म दिव्य दृष्टि है। जिसने जो कर्म किया है उसका यथावत भुगतान करते हैं।  शनि जी की मूर्ति के अगल-बगल में कौआ जरूर होता है |
ग्रंथों में उल्लेख है कि शनिदेवसूर्य के पुत्र हैं। छाया [सवर्णा] इनकी माता हैं। सूर्यपुत्र होने के कारण शनि के व्यक्तित्व में अपने पिता की तेजस्विता विद्यमान है। सूर्य के पुत्र शनि उनके समान धीर-गंभीर तथा काल की गति को समझने वाले हैं। इनके भाई यम काल-स्वरूप होने के कारण मृत्यु के देवता हैं। यमुना [कालिंदी] इनकी बहन हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी बनी।
शनि का कार्यक्षेत्र भूमि, भूमिकर्म, भूस्वामी, खेती-बाड़ी, भूगर्भीय पदार्थ, मजदूर वर्ग, खान व खनिज पदार्थ, वृद्ध व्यक्ति, प्राचीन स्थल, रात्रि का कारक है, शनि शरीर में पांव, घुटने संधि स्थान विकार, पेट मज्जा, दुर्बलता चोट-मोच, पक्षाघात, गंजापन, केश न्यूनता उन्माद, लंगड़ापन को दर्शाता है |
शनि जयंती पर शनि देव की पूजा ओर भगवान शंकर की पूजा करने से उत्तम फल मिलता है | हनुमान चालीसा शनि उपाय हेतु रामबाण औषधि है। हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने से चमत्कारिक फल मिलता है।  शिव जी का अभिषेक करने से भी लाभ मिलता है |
"ॐ शं शनैश्चराय नमः",
ये मँत्र वाकई बहुत प्रभावशाली है किँतु सबके लिए नहीँ है जिनका शनि अच्छा है उन्हेँ ये मँत्र नहीँ जपना चाहिए । कुछ लोग तो शनि को ही ईश्वर बता कर ये मँत्र बता रहे हैँ जो पूर्णतः गलत है।
वृश्चिक राशि में शनि वक्री और 18 मई को पड़ने वाली सोमवती  मावस
2 नवंबर 2014 से शनि महाराज का गोचर वृश्चिक राशि में है , शनि महाराज का प्रत्येक राशि में प्रवास ढाई वर्ष के लिए होता है ।
आज कल वृश्चिक राशि में शनि महाराज वक्री भी हैं जो की 15 मार्च 2015 से लेकर 2 अगस्त 2015 तक रहेगा ।
शनि महराज के वृश्चिक में रहने से तुला / वृश्चिक / धनु राशि पर साढ़ेसाती रहेगा ।
वृश्चिक मंगल की राशि है जो की अग्नि का कारक है शास्त्र अनुसार पृथ्वी का पुत्र माना गया है ।
शनि लोहे , तेल , हथियार , सीमेन्ट आदि वस्तुओं के स्वामी हैं ।
अग्नि और तेल का ये मिलन वृश्चिक राशि होना संसार पर दुष प्रभाव डालता है।

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