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admin - 4:21:00 am

शिखा की आवश्यकता क्यों ?

जिस प्रकार एरियल अथवा एन्टेना रेडियो और टीवी की तरंगे ग्रहण करता है,  उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की सूक्ष्म शक्तियों को ग्रहण करने का कार्य शिखा स्थान द्वारा ही होता है।
शिखा(चोटी) रखना हमारी संस्कृति का एक पावन संस्कार है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक नेल्सन ने अपनी पुस्तक ʹह्यूमन मशीनʹ में लिखा हैः ʹमानव-शरीर में सतर्कता के सारे कार्यक्रमों का संचालन सिर पर शिखा रखने के स्थान से होता है।ʹ
भारतीय संस्कृति का छोटे-से-छोटा सिद्धान्त, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी है। प्रसिद्ध विद्वान डॉ. आई.ई. क्लार्क ने कहा हैः "मैंने जब से इस विज्ञान की खोज की है तब से मुझे विश्वास हो गया है कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण है। चोटी रखना हिन्दुओं का धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केन्द्रों की रक्षा के लिए ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार है।"
शिखा रखने के लाभः
सुषुम्ना नाड़ी की रक्षा से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता है। नेत्रज्योति सुरक्षित रहती है।
कार्यों में सफलता मिलती है। दैवी शक्तियाँ रक्षा करती हैं।
सदबुद्धि, सदविचार आदि की प्राप्ति होती है। आत्मशक्ति प्रबल बनी रहती है। मनुष्य धार्मिक, सात्त्विक व संयमी बना रहता है।
इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट हो जाती है। परंतु आज फैशन की होड़ में भारतवासी शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपने धर्म व संस्कृति का त्याग कर डालते हैं। लोग हँसी उड़ायें, पागल कहें तो सह लो पर संस्कृति का त्याग मत करो।

श्री रामानुजाचार्य ने कुछ उपाय बताये हैं, जिनका आश्रय लेने से साधक सिद्ध बन सकता है। वे उपाय हैं :

विवेक: आत्मा अविनाशी है, जगत विनाशी है। देह हाड़ मांस का पिंजर है, आत्मा अमर है । शरीर के साथ आत्मा का कतई सम्बन्ध नहीं है और वह आत्मा ही परमात्मा है । इस प्रकार का तीव्र विवेक रखें ।

विमुखता: जिन वस्तुओं, व्यसनों को ईश्वर प्राप्ति के लिए त्याग दिया, फिर उनकी ओर न देखें, उनसे विमुख हो जायें । घर का त्याग कर दिया तो फिर उस ओर मुड़-मुड़कर न देखें । व्यसन छोड़ दिये तो फिर दुबारा न करें । जैसे कोई वमन करता है तो फिर उसे चाटने नहीं जाता, ऐसे ही ईश्वर प्राप्ति में विघ्न डालनेवाले जो कर्म हैं उन्हें एक बार छोड़ दिया तो फिर दुबारा न करें |

अभ्यास: भगवान के नाम जप का, भगवान के ध्यान का, सत्संग में जो ज्ञान सुना है उसका नित्य, निरंतर अभ्यास करें ।

कल्याण: जो अपना कल्याण चाहता है वह औरों का कल्याण करे, निष्काम भाव से औरों की सेवा करे ।

भगवत्प्राप्तिजन्य क्रिया: जो कार्य तन से करें उनमें भी भगवत्प्राप्ति का भाव हो, जो विचार मन से करें उनमें भी भगवत्प्राप्ति का भाव हो और जो निश्चय बुद्धि से करें उन्हें भी भगवत्प्राप्ति के लिए करें ।

अनवसाद: कोई भी दु:खद घटना घट जाय तो उसे बार-बार याद करके दु:खी न हों ।

अनुहर्षात्: किसी भी सुखद घटना में हर्ष से फुलें नहीं । जो साधक इन सात उपायों को अपनाता है वह सिद्धि प्राप्त कर लेता है ।13:10
परमात्म प्राप्ति के सात सचोट उपाय
पहला उपाय: परमात्म तत्त्व की कथा का श्रवण करें ।

दूसरा उपाय: सत्पुरुषों के सान्निध्य में रहें ।
जैसा संग वैसा रंग
संग का रंग अवश्य लगता है । यदि सज्जन व्यक्ति भी दुर्जन का अधिक संग करे तो उसे कुसंग का रंग अवश्य लग जायेगा । इसी प्रकार यदि दुर्जन से दुर्जन व्यक्ति भी महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त करे तो देर सवेर वह भी महापुरुष हो जायेगा ।

तीसरा उपाय: प्रेमपूर्वक नामजप संकीर्तन करें । तुलसीदासजी कहते हैं:

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा ।
पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥

यदि मंत्र किसी ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु द्वारा प्राप्त हो और नियमपूर्वक उसका जप किया जाय तो कितना भी दुष्ट अथवा भोगी व्यक्ति हो, उसका जीवन बदल जायेगा । दुष्ट की दुष्टता सज्जनता में बदल जायेगी । भोगी का भोग योग में बदल जायेगा ।

चौथा उपाय: सुख दु:ख को प्रसन्नचित्त से भगवान का विधान समझें । परिस्थितियों को आने जानेवाली समझकर बीतने दें । घबरायें नहीं या आकर्षित न हों ।

ऐसा नहीं कि कुछ अच्छा हो गया तो खुश हो जायें कि “भगवान की बड़ी कृपा है” और कुछ बुरा हो गया तो कहें: “भगवान ने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं किया |”

लेकिन आपको क्या पता कि भगवान आपका कितना हित चाहते हैं ? इसलिए कभी भी अपने को दु:खद चिंतन या निराशा की खाई में नहीं गिराना चाहिए और न ही अहंकार की दलदल में फँसना चाहिए वरन् यह विचार करें कि संसार सपना है । इसमें ऐसा तो होता रहता है ।

पाँचवाँ उपाय: सबको भगवान का अंश मानकर सबके हित की भावना करें । मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही हो जाता है इसलिए कभी शत्रु का भी बुरा नहीं सोचना चाहिए, बल्कि प्रार्थना करनी चाहिए कि परमात्मा उसे सदबुद्धि दें, सन्मार्ग दिखायें । ऐसी भावना करने से शत्रु की शत्रुता भी मित्रता में बदल सकती है ।

छ्ठा उपाय: ईश्वर को जानने की उत्कंठा जागृत करें । जहाँ चाह वहाँ राह । जिसके हृदय में ईश्वर के लिए चाह होगी, उस रसस्वरुप को जानने की जिज्ञासा होगी, उस आनंदस्वरुप के आनंद के आस्वादन की तड़प होगी, प्यास होगी वह अवश्य ही परमात्म प्रेरणा से संतों के द्वार तक पहँच जायेगा और देर सवेर परमात्म साक्षात्कार कर जन्म मरण से मुक्त हो जायेगा ।

सातवाँ उपाय: साधनकाल में एकांतवास आपके लिए अत्यंत आवश्यक है । भगवान बुद्ध ने छ: साल तक अरण्य में एकांतवास किया था । श्रीमद् आघ शंकराचार्यजी ने नर्मदा तट पर सदगुरु के सान्निध्य में एकान्तवास में रहकर ध्यानयोग, ज्ञानयोग इत्यादि के उत्तुंग शिखर सर किये थे । उनके दादागुरु गौड़पादाचार्यजी ने एवं सदगुरु गोविन्दपादाचार्यजी ने भी एकांत सेवन किया था, अपनी वृत्तियों को इन्द्रियों से हटाकर अंतर्मुख किया था । अत: एकांत में प्रार्थना और ब्रह्माभ्यास करें ।

यदि इन सात बातों को जीवन में उतार लें तो अवश्य ही परमात्मा का अनुभव होगा



एक बार तुलसी दास जी से किसी ने पूछा:
कभी-कभी भक्ति करने को मन नहीं करता फिर भी
सिमरन के लिये बैठ जाते है ;क्या उसका भी कोई
फल मिलता है ?

तुलसी दास जी ने मुस्करा कर कहा: तुलसी मेरे
राम को रीझ भजो या खीज ।
भौम पड़ा जामे सभी उल्टा सीधा बीज।
अर्थात भूमि में जब बीज बोये जाते है तो यह
नहीं देखा जाता कि बीज उल्टे पड़े है या सीधे
पर फिर भी कालांतर में फसल बन जाती है
इसी प्रकार नाम सुमिरन कैसे भी किया जाये
उस का फल अवश्य ही मिला करता है

भगवद् गीता अध्याय: 3
श्लोक 27

श्लोक:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

भावार्थ:
- वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है
॥27॥

प्रत्येक प्राणी का उद्देश्य है सर्व दुःखों का नाश और नित्य सुख की प्राप्ति। जो भी कार्य हम करते हैं, चाहे अच्छा भोजन करते हैं अथवा सिनेमा देखते हैं, उन सबके पीछे यही हेतु होता है कि सुख मिले। सुख भी हम ऐसा चाहते हैं जो सदा बना रहे, जिसका कभी नाश न हो। परंतु जीवनभर कर्म करने पर भी पूर्ण सुख नहीं मिलता। फिर आपके कर्म करने का क्या फायदा ? जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए आजीवन कड़ी मेहनत की, फिर भी वह न मिले तो मेहनत तो व्यर्थ ही गयी न ? जब आवश्यकता भी है और पुरूषार्थ भी है तो सफलता क्यों नहीं मिलती ? इस पर विचार किया है कभी ?

बात बड़ी सीधी सी है कि तड़प और पुरूषार्थ तो है परंतु सही दिशा नहीं है। जरा कल्पना करो कि एक व्यक्ति गर्मियों की तपती दोपहरी में रेगिस्तान से गुजर रहा है और उसे बड़ी प्यास लगी है। रेत पर जब धूप पड़ती है तो वह दूर से पानी की तरह दिखती है।

अब वह यात्री इधर-उधर दौड़ रहा है। जहाँ भी देखता है थोड़ी दूरी पर पानी होने का आभास होता है परंतु निकट जाता है तो रेत-ही-रेत और इसी प्रकार इधर-उधर भटककर बेचारा प्यासा मर जाता है।

अब उस यात्री को पानी की तड़प भी थी और उसे पाने के लिए पुरूषार्थ भी किया था, फिर भी प्यासा क्यों मरा ? क्योंकि पानी को रेगिस्तान में ढूँढ रहा था। जितनी मेहनत से वह रेत में इधर-उधर दौड़ता रहा, उतनी मेहनत करके किसी नदी या कुएँ तक पहुँच जाता तो प्यास भी बुझती और प्राण भी बचते। साधारण संसारी व्यक्ति की भी ऐसी ही दशा होती है। वह सुख तो चाहता है सदा रहने वाला, परंतु उसे ढूँढता है क्षणभंगुर संसार में ! मिटने वाली और बदलने वाली वस्तुओं-परिस्थितियों से एक सा सुख कैसे मिल सकता है ?

शाश्वत सुख शाश्वत वस्तु से ही मिल सकता है और वह शाश्वत वस्तु है आत्मा। अब अनित्य पदार्थों में नित्य सुख ढूँढने वाला व्यक्ति यदि अपने पुरूषार्थ की दिशा बदल दे और नित्य आत्मसुख की प्राप्ति में लग जाय तो उसे लक्ष्यप्राप्ति में देर ही कहाँ लगेगी ! परंतु भगवान की यह माया बड़ी विचित्र है। जीव को वह इस प्रकार से भ्रमित कर देती है कि बेचारे को यह विवेक ही नहीं उपजता कि मैं रेगिस्तान में जल ढूँढकर अपने पुरूषार्थ एवं जीवन के अमूल्य समय को व्यर्थ में नष्ट कर रहा हूँ।

यदि नित्य सुख को वास्तव में प्राप्त करना हो तो बाह्य पदार्थों के असली स्वरूप को समझना पड़ेगा।

अंक ‘एक’ के बाद जितने शून्य लगते हैं, उसकी कीमत में उतनी ही वृद्धि होती है परंतु यदि एक को मिटा दिया जाय तो दाहिनी ओर कितनी भी शून्य हों उनका कोई मूल्य नहीं। उन बिन्दियों का मूल्य उस संख्या ‘एक’ के कारण है। इसी प्रकार संसार की पदार्थों की सत्ता है ही नहीं। जब हम उस सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करके उसकी ओर चलते हैं तो हमारे पास उपलब्ध पदार्थों का उपयोग भी उसी सत्कार्य में होता है। अतः उनकी शोभा बढ़ती है। परंतु जब हम उस ‘एक’ का अस्तित्व भुला बैठते हैं तो हमारे पास शून्यरूपी वस्तुएँ कितनी भी क्यों न हों, वे दुःखदायी ही होती हैं तथा पापकर्म और जन्म-मरण का कारण बनती हैं।

जो लोग विषय-भोगों को मक्खन और पेड़ा समझते हैं, वे मानों चूना खाते हैं। चूना खाने वाले की क्या दशा होती है यह सभी जानते हैं। बेचारा बेमौत मारा जाता है।

हमारी चाह तो उत्तम है परंतु उसे पाने का जो प्रयत्न कर रहे है उसके मूल में ही भूल है। हम अनित्य पदार्थों को नित्य समझकर उनसे सुख लेना चाहते हैं। शरीर हमारा है इससे सुख लें, परंतु शरीर का क्या भरोसा ? इस पर गर्व किसलिये ? जब शरीर ही स्थिर नहीं है तो फिर शरीर को मिलने वाले पदार्थ, विषय, सम्बन्ध आदि कहाँ से स्थिर होंगे ? धन इकट्ठा करने और सम्मान प्राप्त करने के लिए हम क्या-क्या नहीं करते, यद्यपि हम यह भी जानते हैं कि यह सब अंत में काम नहीं आयेगा। अस्थिर पदार्थों की तो बड़ी चिंता करते हैं परंतु हम वास्तव में क्या हैं, यह कभी सोचते ही नहीं। हम ड्राइवर हैं परंतु स्वयं को मोटर समझ बैठे हैं, हम मकान के स्वामी हैं परंतु अपने को मकान समझते हैं। हम अमर आत्मा है परंतु अपने को शरीर समझ बैठे हैं। बस यही भूल है, जिसने हमें सुख के लिए भटकना सिखाया है।

संसार की कोई भी वस्तु सुन्दर और आनंदरूप नहीं है। सुन्दर और आनंदरूप एक परमात्मा ही है। उसी के सौन्दर्य का थोड़ा अंश प्राप्त होने से यह संसार सुन्दर लगता है। उस आनंदस्वरूप की सत्ता से चल रहा है इसीलिए इसमें भी आनंद भासता है। अतः हमें चाहिए कि संसार के पदार्थ जिसकी सत्ता से आनंददायी व सुखरूप भासते हैं, उसी ईश्वर से अपना दिल मिलाकर भगवदानंद प्राप्त करें जो इस शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, किंतु शर्त यह है कि हम अपने पुरूषार्थ को उस ओर लगायें। हम उद्यम कर सकते हैं, कष्ट भी सह सकते हैं, केवल इच्छा को परिवर्तित करना होगा। ऐसा आज तक नहीं हुआ कि मनुष्य को किसी पदार्थ की प्रबल इच्छा हो और वह उसे प्राप्त न हुआ हो।

प्रत्येक प्राणी की दौड़ आनंद की ओर है। चाहे करोड़पति क्यों न हो, वह भी सुख के लिए, आनंद के लिए ही भागता-फिरता है। यहाँ तक कि मकोड़ी भी आनंद की प्राप्ति के लिए ही दौड़ रही है। वह भी दुःख नहीं चाहती, मरना नहीं चाहती। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक प्राणी आनंद के लिए दौड़ रहा है परंतु उसे नश्वर वस्तुओं में ढूँढता है। इसलिए दौड़-भाग में ही समय पूरा हो जाता है, आनंद मिलता ही नहीं।

नानकजी ने फरमाया हैः

नानक दुखिया सब संसार। दुःख संसार में है परंतु आत्मा में तो संसार है ही नहीं और वह आत्मा हमारी जान है। यदि उस आत्मा को पाने को यत्न करोगे तो तुम्हें आनंद और सुख के अतिरिक्त कुछ दिखेगा ही नहीं। प्रबल इच्छा और उद्यम हो तो इच्छित वस्तु प्राप्त होकर ही रहती है।

अतः सज्जनो ! चित्त में प्रबल इच्छा रखो और उद्यम करो, परंतु किसके लिये ? नश्वर और तुच्छ संसार के लिए ? नहीं। वह तुम्हारे साथ सदा नहीं रहेगा क्योंकि संसार अनित्य है। जो स्वयं अनित्य है वह तुम्हें नित्य सुख कैसे देगा ? जैसे, साँप बाहर से तो चमकीला और कोमल दिखता है परंतु उसकी असलियत क्या होती है यह तुम जानते हो। ऐसे ही संसार भी दिखने भर को सुन्दर लगता है, इसकी असलियत जाननी हो तो विवेक दे देखो सब पता चल जायगा। इसलिए इच्छा करो मुक्तात्मा होने की, अपने-आपको खोजने की, अपने मुक्त आत्मा को जानने की और उद्यम करो नित्य सुखस्वरूप, आनंदस्वरूप, अविनाशी आत्मा को पाने के लिए। —
[09:16, 13/04/2015] ‪+91 99916 31999‬: दोस्तो आपके घर में फ़्रिज होगा ।
लेकिन क्या आप फ़्रिज का इतिहास जानते है? ?
कि कैसे ये युरोप के देशो से भारत में आया और क्यों आया ? ? ? ?
कुछ वर्ष पहले KELVINATOR नाम की फ़्रिज बनाने वाली कंपनी भारत में आई ।
क्यों आई ? ?
क्या उसके मन में दया आ गई कि भारत के लोगो को ठंडा पानी पिलाना है ।
नहीं कारण कुछ और था । वो कारण ये था कि KELVINATOR की marketing खत्म हो गयी पुरे युरोप और अमेरिका में |
क्यों खत्म हो गई ? ? ?
क्यों कि अमेरिका और युरोप के देशो में एक समस्या शुरु हो गई (कलोरो फ़लोरो कार्बन के एमिशन की ) (C.F.C) |
ये समस्या रेफ़ारिजरेटर के कारण हुई । क्योंके कि इससे C.F.C बहुत निकलता है ।
C.F.C से होता क्या है कि हमारे वातावरण एक़ अजोन परत होती है जो हमको सूर्य से निकलने वाली अॅल्ट्रा वालेट रेन से बचाती है ।ये अगर आपकी चमड़ी पर सीधी पर जाये तो आपकी चमड़ी जल जायेगी ।
तो हुआ ये कि कि रेफ़्रिजरेटर की जितनी तकनीकी दुनिया में विकसित हुई । उस से c.f.c की समस्या बढ़ गई और इतनी बढ़ गई कि युरोप के कुछ देश के आसमान में अजोन खत्म होने से एक बहुत भारी होल हो गया । जिससे वहां गर्मी बढ़ने लगी और गलेशियर पिघलने लगे । नदियओ में पानी ज्यादा होने लगा और वहां बाढ़ आ गई ।
1996 में अमेरिका के लासएंजलेस में बाढ़ आई । इतना बढ़ा अमेरिका का मैनेमेंट सिस्टम था लेकिन कुछ नहीं कर पाया । बाद पता लगा कि बाढ़ क्यों आई कि अमेरिका में गर्मी बढ़ गई और गलेशियर पिघले और नदियों पानी ज्यादा हुआ और बाढ़ आई ।

कारण पाता कि C.F.C एमिइशन बढ़ने से वातावरण में गर्मी बढ़ी ।
तो इन सारे देशो में एक भयंकर किस्म की घबराह्ट होने लगी ।
तो इन 12 ,13 देशो में नय एक समझोता किया कि धीरे धीरे इस c.f.c एमिइशन को technology ख्त्म कर देगें 2000 तक आते आते पुरा खत्म कर देगें ।
तो किसी ने सवाल किया कि c.f.c बनाने वाली टैकनोलोजी का क्या होगा । तो किसी ने कहा कि भारत में लाकर डंप कर देगें ।
फ़िर इसको लेकर वो भारत में घुस आये ।
अब डंप करने वाली वस्तु बिकेगी कैसे ? ? ?
तो इसके लिये उनहोने हैवी विज्ञापन किये कि आपका घर कुछ भी नहीं है अगर आपके घर में फ़्रिज नहीं है । आपका घर रद्दी है अगर आपके घर मे फ़्रिज नहीं है ।
अब रोज रोज टी वी आप यही बात सुनेगे तो एक दिन उठा कर घर ले ही आयेगें ।
हिंदुस्तान के मूर्ख लोगो ने एक मिनट नहीं सोचा कि इस फ़्रिज की हमको क्या जरुर है । अब ले आये है तो किया किया पहले रोज अच्छी भली ताजी सब्ज़ी खाते थे । अब सब्ज़िया ला ला कर उसको फ़्रिज में भर देते है ।
युरोप के देश सुखे है और वहां कुछ परंपरा भी ऐसी है कि रोज खाना नहीं बनाते । और सब्ज़िया भी रोज वहां मिलती नहीं है जो जाती है वो भारत से जाती है तो हफ़ते में एक दिन सब्ज़िया ख़रीद लाते उनको फ़्रिज में भर देते है वो पुरा हफ़ता खाते है ।
लेकिन हमारे भारत में तो हर दिन ताजी सब्ज़ी मिलती हैं और सुबह को अलग मिलती है दोपहर, शाम को अलग मिलती है । और भारत में हमारी मां हमे रोज गर्म गर्म रोटी बना कर देती है युरोप में किसी की मां नहीं देती ।
तो उनको जरुरत थी तो उनहोने अपने लिये फ़्रिज बनाया और और हम बिना वजह उठा इसे घर ले आये ।
अब एक और मूर्खता करते है पलास्टिक की बोतल मे फ़्रिज में ठंडा पानी रख देगें ।
आप जानते है पुरी दुनिया में पलास्टिक सबसे घटिया वस्तु है कुछ खाने और पीने के लिये!
जपान और कई अन्य देशो खाने पीने की चीज़े पलस्टिक पैकिंग़ मे बेचने पर बैन लगा दिया है । ।
युरोप के देशो के लोगो को एक आदत है कोई भी चीज़ पीयें तो आधे से ज्यादा उनमे बर्फ़ डालेगें और एक दम ठंडी करके पीयेंगे ।
नतीजा ये है अमेरिका मे हर दुसरा आदमी कबजियत का शिकर हैं । पिछले एक सर्वे के अनुसार 90% अमेरिका के लोगो को कबजियत की परेशानी है घंटो घंटो टायलेट मे बैठे रहते हैं लेकिन टायलेट नहीं आती । वहां डाकटरो का कहना है कि उनके देश में कबजियत का सबसे बढ़ा कारण लोगो का ठंडा पानी पीना हैं अगर इससे बचन है तो ताजा पानी पियो ।
हमारे भारत में हजारो साल से शास्त्र यही सिखाते है कि ताजा पानी पियो ।
तो मित्रो विदेशियों द्वारा बहुत बार अपना माल बिकवाने के लिए पहले उस चीज को आपकी जरूरत बनाया जाता है !
और फिर आपके देश मे डंप किया जाता है !
और विस्तार से जानने के लिए एक बार यहाँ जरूर click करें !
https://www.youtube.com/watch?v=WFSJ865yjKo
वन्देमातरम !

श्री महाराणा प्रताप के बारे मे कुछ जाने कुछ अन्जाने तथ्य"☀

नाम - कुँवर प्रताप जी {श्री महाराणा प्रतापसिंह जी}
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - राजस्थान कुम्भलगढ़
पुन्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई.
पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य सीमा - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शा. अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह जी
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह जी
अन्य जानकारी - श्री महाराणा प्रताप सिंह
जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,
जिसका नाम 'चेतक' था।
"राजपूत शिरोमणि श्री महाराणा प्रतापसिंह जी" उदयपुर,
मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।
वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि परमेवाड़-मुकुट मणि
राणा प्रताप जी का जन्म हुआ। श्री प्रताप जी का नाम
इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।
श्री महाराणा प्रताप जी की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर
के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती
है।
श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के बारे में कुछ रोचक जानकारी
:-
1... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी एक ही झटके में घोड़े समेत
दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने
अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला ” उस महान देश की वीर भूमि
हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी
प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के
बदले अपनी मातृभूमि को चुना ”
बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़
प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप ये बात पढ़ सकते है |
3.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के भाले का वजन 80
किलो था और कवच का वजन 80 किलो कवच , भाला, ढाल,
और हाथ में तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान
उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है
तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर
की ही रहेगी पर श्री महाराणा प्रताप जी ने किसी की भी
आधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और
अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... श्री महाराणा प्रताप जी के घोड़े चेतक का मंदिर भी
बना हुआ  हैं जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... श्री महाराणा प्रताप जी ने जब महलो का त्याग किया
तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा
और दिन रात राणा जी कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी
समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया
लोहार कहा जाता है मै नमन करती हूँ एसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में
तलवारें पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985
में हल्दी घाटी में मिला |
10..... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी अस्त्र शस्त्र की
शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत
वीरो को लेकर 60000 से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे
जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के देहांत पर अकबर भी
रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो श्री
महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी
बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के
राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील |
13..... राणा जी का घोडा चेतक महाराणा जी को 26 फीट
का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी
एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहा वो
घायल हुआ वहीं आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक
की म्रत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |
14..... राणा जी का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमीत करने के लिए हाथी
की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे
|
15..... मरने से पहले श्री महाराणाप्रताप जी ने अपना खोया
हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और
महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |
16.... श्री महाराणा प्रताप जी का वजन 110 किलो और
लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का
भाला रखते थे हाथ मे।



महाराणा प्रताप के हाथी
की कहानी।:---
मित्रो आप सब ने महाराणा
प्रताप के घोंड़े चेतक के बारे
में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी
भी था।
जिसका नाम था रामप्रसाद।
उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हूँ।
रामप्रसाद हाथी का उल्लेख
अल- बदायुनी ने जो मुगलों
की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने
अपने एक ग्रन्थ में कीया है।
वो लिखता है की जब महाराणा
प्रताप पर अकबर ने चढाई की
थी तब उसने दो चीजो को
ही बंदी बनाने की मांग की
थी एक तो खुद महाराणा
और दूसरा उनका हाथी
रामप्रसाद।
आगे अल बदायुनी लिखता है
की वो हाथी इतना समझदार
व ताकतवर था की उसने
हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही
अकबर के 13 हाथियों को मार
गिराया था
और वो लिखता है की:
उस हाथी को पकड़ने के लिए
हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यू बनाया और उन पर
14 महावतो को बिठाया तब
कही जाके उसे बंदी बना पाये।
अब सुनिए एक भारतीय
जानवर
की स्वामी भक्ति।
उस हाथी को अकबर के समक्ष
पेश
किया गया जहा अकबर ने
उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने
और पानी दिया।
पर उस स्वामिभक्त हाथी ने
18 दिन तक मुगलों का नही
तो दाना खाया और ना ही
पानी पीया और वो शहीद
हो गया।
तब अकबर ने कहा था कि;-
जिसके हाथी को मै मेरे सामने
नहीं झुका पाया उस महाराणा
प्रताप को क्या झुका पाउँगा।
ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ
जानवर थे।
इसलिए मित्रो हमेशा अपने
भारतीय होने पे गर्व करो।
पढ़ के सीना चौड़ा हुआ हो
तो शेयर कर देना।