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जानिए चन्द्र ग्रहण 04 अप्रेल 2015 शनिवार का प्रभाव और महत्त्व hanuman jayanti chandra grahan sutak

साभार-निए चन्द्र ग्रहण 04 अप्रेल,2015 (शनिवार
को) का प्रभाव और महत्त्व–.



जानिए चन्द्र ग्रहण 04 अप्रेल,2015 (शनिवार को)
का प्रभाव और महत्त्व–….



खग्रास चंद्रग्रहण — [ भारत में ग्रस्तोदय खण्डग्रास
चन्द्र ग्रहण द्रश्य ]—


इस वर्ष हनुमान जयंती पर पूर्ण चन्द्रग्रहण का संयोग
4 अप्रेल 2015 को बन रहा हैं। 


अगले माह 4 अप्रेल
2015 को इस ग्रहण का स्पर्श भारत में कही भी
द्रश्य नहीं होगा। यह ग्रहण भारत के साथ साथ
चीन,ऑस्ट्रेलिया, उतरी व दक्षिणी अमेरिका के
पूर्वी भाग स्थित नगरो में भी दिखाई देगा..।




 चैत्र
शुक्ल पूर्णिमा शनिवार दिनांक 4 अप्रैल 2015 ई को
दोपहर बाद से सायकाल तक होने वाला खग्रास
चन्द्र ग्रहण सम्पूर्ण भारत में ग्रस्तोदय खण्डग्रास के
रूप में दिखाई देगा।



इस वर्ष 2015 में शनिवार के साथ अजब संयोग जुड़ा
हुआ है। अप्रैल, जून, अगस्त, अक्टूबर और दिसंबर में जिस
तारीख को शनिवार पड़ रहा है, उस तारीख और
माह के अंक एक ही है। जैसे 4 अप्रैल 2015 (शनिवार)
को चन्द्र प्रधान हस्त नक्षत्र की युति बन रही है,
जो कि हर तरह के रोगों का क्षरण करने वाली युति
बन रही है। इस दिन का मूलाक भी आठ है, जो कि
शनि प्रधान है।



हनुमान जन्मोत्सव पर इस बार चन्द्रग्रहण की छाया
है। अगले माह 4 अप्रेल 2015 को पड़ने वाली हनुमान
जयंती पर अल्प खण्डग्रास चंद्र ग्रहण होगा। इस दिन
हनुमत आराधना का विशेष महत्व होगा। इससे पहले
15 अप्रेल 1995 को ग्रस्तोदय चन्द्रग्रहण और 2 अप्रेल
1996 को खण्डग्रास चंद्रग्रहण हनुमान जयंती पर आए
थे।इस दिन जातक को शनि की ढैय्या व साढ़े साती
से बचने के लिए हनुमान जी उपासना करें। मंगल दोष
निवारण के लिए भी हनुमत उपासना श्रेष्ठ सिद्ध
होगी।



इस ग्रहण के प्रारम्भ व समाप्ति काल भारतीय
स्टैंडर्ड टाइम में इस प्रकार है –
ग्रहण प्रारम्भ – दोपहर बाद – 03. 45 बजे
ग्रहण समाप्त – सांय – 07 .15 बजे
ग्रहण का सूतक — इस ग्रहण का सूतक दिनांक 4
अप्रेल 2015 ई को सूर्यूदय के साथ ही प्रारम्भ हो
जायेगा। सूतक प्रारम्भ हो जाने बाद [बच्चो वृद्ध व
रोगियों को छोड़कर ] धार्मिक जानो को भोजन
आदि नहीं करना चाहिए।
उज्जैन (मध्यप्रदेश) में खण्डग्रास चन्द्र ग्रहण का समय

चन्द्र ग्रहण प्रारम्भ (चन्द्रोदय के साथ) – 18:46:05
चन्द्र ग्रहण समाप्त – 19:15:20
स्थानीय ग्रहण की अवधि – 00 घण्टे 29 मिनट 15
सेकेंड
चन्द्रोदय – 18:46:05
उपच्छाया से पहला स्पर्श – १४:३३:२९
प्रच्छाया से पहला स्पर्श – १५:४७:३८
परमग्रास चन्द्र ग्रहण – १७:३१:२९
प्रच्छाया से अन्तिम स्पर्श – 19:15:20
उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श – 20:29:29
खण्डग्रास की अवधि – 03 घण्टे 27 मिनट 42 सेकेंड
उपच्छाया की अवधि – 05 घण्टे 55 मिनट 59 सेकेंड
चन्द्रग्रहण कब होता है?
जब सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है तो
सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नहीं पड़ता है। चूंकि
ग्रहों व उपग्रहों का अपना कोई प्रकाश नहीं है, ये
केवल सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं अतः
चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश न पड़ने के कारण ही
चन्द्र ग्रहण होता है। चन्द्रग्रहण का प्रकार और
उसकी लम्बाई चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों व
उसके कक्षीय पथ पर निर्भर करती है।
जब हम जमीन पर खड़े होते हैं और सूरज कि रोशनी
हमारी शारीर पर पड़ती है, तो जमीन पर हमें अपनी
परछाई दिखती है l ठीक इसी प्रकार चन्द्रमा और
पृथ्वी पर सूर्य के प्रकाश के पड़ने पर परछाइयां
आकाश में बनती हैं l चुकि पृथ्वी और चन्द्रमा का
आकार गोल है, इसलिए इसकी परछाइयां शंकु के
आकार कि होती हैं l ये परछाइयां बहुत लम्बी होती
हैं l जो पिण्ड सूरज से जितनी अधिक दुरी पर होगा,
परछाइयां भी उतनी ही अधिक लम्बी होंगी l ग्रहण
का अर्थ है , किसी पिण्ड के हिस्से पर परछाई पड़ने
से कालापन (अंधेरा हो जाना) l




हम जानते है कि पृथ्वी सूर्य कि परिक्रमा करती है
और चन्द्रमा पृथ्वी कि परिक्रमा करता है ये दोनों
ही हज़ारों मिल लम्बी परछाइयां बनाते हैं, घूमते-घूमते
जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक ही सीधी रेखा में
आ जाते है, तथा पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच में
होती है, तो पृथ्वी कि परछाई या छाया, जो सूर्य
के विपरीत दिशा में होती है, चन्द्रमा पर पड़ती है l
यह भी कह सकते है. कि पृथ्वी के बीच में आ जाने से
सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नहीं पहुच पाता l
जितने स्थान पर प्रकाश नहीं पहुच पता, उतना स्थान
प्रकाश रहित (अन्धकार युक्त) हो जाता है l यही
चन्द्रग्रहण कहलाता है l ऐसी स्थिति पूर्णिमा के
दिन ही आ सकती है l इसलिए चन्द्रग्रहण जब भी
होता है, केवल पूर्णिमा के दिन ही होता है l
चन्द्रमा का जितना हिस्सा परछाई से ढक जाता
है, उतना ही चन्द्रग्रहण होता है l यदि पृथ्वी कि
छाया पुरे चन्द्रमा को ढक लेती है, तो पूर्ण
चन्द्रग्रहण हो जाता है l आमतौर पर एक वर्ष में
चन्द्रमा के तीन ग्रहण होते हैं l जिनमें एक पूर्ण
चन्द्रग्रहण होता है l





अब प्रश्न उठता है कि पूर्णिमा तो हर महीने होती
है, लेकिन चन्द्रग्रहण तो हर मास नहीं होता l इसका
कारण यह है कि चन्द्रमा के घुमने के रास्ते का ताल
पृथ्वी के भ्रमंपथ के ताल के साथ 5 डिग्री का कोण
बंटा है l इस कारण चन्द्रमा पृथ्वी कि छाया के स्तर
से उपर निचे घूमता है l कभी-कभी ही ये तीनों एक
सीधे में आते हैं l अत: चन्द्रग्रहण हर पूर्णिमा को नहीँ
पड़ता l गणित का प्रयोग करके खगोलविद् आसानी
से यह बता देते हैं कि चन्द्रग्रहण कब पड़ेगा और वह
कितने समय रहेगा l


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क्या सावधानियां रखें ग्रहण के दोरान..???
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार यदि आप गर्भवती हैं, या आपके घर में कोई
महिला गर्भवती है या फिर आप इस साल फेमिली
प्लानिंग करने जा रहे हैं, तो ग्रहण की इन तिथियों
को कैलेंडर में जरूरनोट कर लें।
–इसके अलावा नया मकान, या नई दुकान लेने जा रहे
हैं, तो इन तिथियों पर लेने से बचें।
—इन तिथियों पर आपकी करियर लाइव, निजी
जीवन, आय के स्रोत, परिवार, प्रेम-संबंध, आदि में
व्यापक परिवर्तन हो सकते हैं। खुशियां आ सकती हैं
या हो सकता है दु:ख घर कर जाये, लिहाजा आपको
इन तिथियों पर विशेष सावधानी बरतनी होगी।
–बेहतर होगा यदि उन सभी बातों का पालन करें,
जो बड़े बुजुर्ग बताते हैं।
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार गर्भवती स्त्री को सूर्य एवं चन्द्रग्रहण नहीं
देखना चाहिए, क्योंकी उसके दुष्प्रभाव से शिशु
अंगहीन होकर विकलांग बन जाता है । गर्भपात की
संभावना बढ़ जाती है । इसके लिए गर्भवती के उदर
भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता
है, जिससे कि राहू केतू उसका स्पर्श न करें. ।
ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्री को कुछ भी कैंची,
चाकू आदि से काटने को मना किया जाता है , और
किसी वस्त्र आदि को सिलने से मना किया जाता
है,क्योंकि ऐसी धारणा है कि ऐसा करने से शिशु के
अंग या तो कट जाते हैं या फिर सिल (जुड़) जाते हैं ।
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पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार क्या सावधानियां रखे ग्रहण के समय..???
====ग्रहण के समय सोने से रोग पकड़ता है किसी
कीमत पर नहीं सोना चाहिए।
===ग्रहण के समय मल-मूत्र त्यागने से घर में दरिद्रता
आती है ।
====शौच करने से पेट में क्रमी रोग पकड़ता है । ये
शास्त्र बातें हैं इसमें किसी का लिहाज नहीं होता।
===ग्रहण के समय संभोग करने से सूअर की योनी
मिलती है ।
===ग्रहण के समय किसी से धोखा या ठगी करने से
सर्प की योनि मिलती है ।
==== जीव-जंतु या किसी की हत्या करने से
नारकीय योनी में भटकना पड़ता है ।
====ग्रहण के समय भोजन अथवा मालिश किया तो
कुष्ठ रोगी के शरीर में जाना पड़ेगा।
===ग्रहण के समय बाथरूम में नहीं जाना पड़े, ऐसा
खायें।
===ग्रहण के दौरान मौन रहोगे, जप और ध्यान करोगे
तो अनंत गुना फल होगा।




पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार ग्रहण विधि निषेध ===
===सूर्यग्रहण मे ग्रहण से चार प्रहर पूर्व और चंद्र ग्रहण
मे तीन प्रहर पूर्व भोजन नहीं करना चाहिये । बूढे
बालक और रोगी एक प्रहर पूर्व तक खा सकते हैं ग्रहण
पूरा होने पर सूर्य या चंद्र, जिसका ग्रहण हो, उसका
शुध्द बिम्बदेख कर भोजन करना चाहिये । (1 प्रहर =
3 घंटे)
=== ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं
तोडना चाहिए । बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने
चाहियेव दंत धावन नहीं करना चाहिये ग्रहण के समय
ताला खोलना, सोना, मल मूत्र का त्याग करना,
मैथुन करना औरभोजन करना – ये सब कार्य वर्जित हैं

===.ग्रहण के समय मन से सत्पात्र को उद्दयेश्य करके
जल मे जल डाल देना चाहिए । ऐसा करने से
देनेवालेको उसका फल प्राप्त होता है और लेनेवाले
को उसका दोष भी नहीं लगता।
===कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया
कार्य शुरु नहीं करना चाहिये ।
===ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थाे मे तिल या कुशा
डाली होती है, वे पदार्थ दुषित नहीं होते । जबकि
पके हुएअन्न का त्याग करके गाय, कुत्ते को डालकर
नया भोजन बनाना चाहिये ।
===ग्रहण वेध के प्रारंभ मे तिल या कुशा मिश्रित
जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति मे ही
करना चाहिये और ग्रहण शुरु होने से अंत तक अन्न या
जल नहीं लेना चाहिये ।
====ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को
अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य
प्राप्तहोता है ।
====तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान
दानादि का ग्रहण में महाफल है, किंतु संतानयुक्त
ग्रहस्थको ग्रहणऔर संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं
करना चाहिये।
==== स्कन्द पुराण के अनुसार ग्रहण के अवसर पर दूसरे
का अन्न खाने से बारह वर्षाे का एकत्र किया हुआ
सब पुण्य नष्ट हो जाता है ।
===. देवी भागवत में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के
अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये ।
====देवी भागवत में आता है की सूर्यग्रहण या
चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने
अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक
नरक में वास करता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित
मनुष्य होता है फिर गुल्मरोगी, काना और दंतहीन
होता है। ग्रहण के अवसर पर पृथवी को नहीं खोदना
चाहिए ।



===== पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–
09669290067) के अनुसार चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर
( 9 घंटे) पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालकक
और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते
हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण
हो, उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए।
==ग्रहण वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी
की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं
होते। जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय,
कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए।
===ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को
अन्न, जररूतमंदों को वस्त्र और उनकी आवश्यक वस्तु
दान करने से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है।
====ग्रहण के समय कोई भी शुभ या नया कार्य शुरू
नहीं करना चाहिए।




===ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से
दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर
और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती
महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना
चाहिए।
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार ग्रहण के समय केसे करें मंत्र सिद्धि .???
1. ग्रहण के समय “ घ् ह्रीं नमः “ मंत्र का 10 माला
जप करें इससे ये मंत्र सिद्धि हो जाता है ।
2. श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत
का स्पर्श करके श्घ् नमो नारायणायश् मंत्र का आठ
हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्ध होने पर उस घृत
को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणाशक्ति),
कवित्व शक्ति तथा वाक सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
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पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार चन्द्र ग्रहण के दौरान पूजा और स्नान
मान्यता है कि चन्द्र ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ,
अनुष्ठान, दान आदि का अत्यधिक फल मिलता है।
मत्स्य पुराण के अनुसार ग्रहण काल के दौरान जातक
को श्वेत पुष्पों और चन्दन आदि से चन्द्रमा की पूजा
करनी चाहिए।
चन्द्र ग्रहण के खत्म होने पर जातक को स्नान और
दान (विशेषकर गाय का दान) करना चाहिए।हिंदू
धर्म की मान्यता के अनुसार चंद्र ग्रहण अच्छा नहीं
माना जाता है। ग्रहण के कुप्रभाव से बचने के लिये इन
तिथियों पर आप गरीबों को दान दें। गरीबों को
भोजन करायें, मंत्रों का उच्चारण करें, जिनमें
गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ फल देगा। अपने ईष्ट देव का
ध्यान करें। भोजन नहीं करें।
ग्रहण के बाद स्नान करें और ताज़ा भोजन करें। साथ
ही यदि आप गर्भवती हैं तो आपके होने वाले बच्चे पर
ग्रहण के प्रभाव से बचाने के लिये एकांत स्थान पर बैठ
जायें और ईश्वर का ध्यान करें। यह काम आप सूर्य
ग्रहण के समय भी करें।
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ग्रहण काल में चन्द्र के प्रभावों को शुभ करने के लिये
चन्द्र की वस्तुओं का दान किया जाता है –
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए निम्न उपाय
करे –
—ग्रहण में बालक, वृद्ध और रोगी के लिए कोई नियम
शास्त्रों में नहीं बताया गया है ।
—-चिटियों को पिसा हुआ चावल व आट्टा डाले ।
— चन्द्र की दान वस्तुओं में मोती, चांदी, चावल,
मिसरी, सफेद कपड़ा,सफेद फूल, शंख, कपूर,श्वेत चंदन,
पलाश की लकड़ी, दूध, दही, चावल, घी, चीनी आदि
का दान करना शुभ रहेगा ,
—कुंडली के अनुसार चन्द्रमा को मन और माँ का
कारक माना गया है जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस
भाव में हो उसके अनुसार दान करना चाहिए . चन्द्र
वृष राशी में शुभ और वृश्चिक राशी में अशुभ होता है ,
जब चन्द्र जन्म कुण्डली मे उच्च का या अपने पक्के
भाव का हो तब चन्द्र से सम्बन्धित वस्तुऑ का दान
नही करना चाहिए, अगर चन्द्र दितीय चतुर्थ भाव मे
हो तो चावल चीनी दुध का दान न करे , यदि चन्द्र
वृश्चिक राशी में हो तो चन्द्र की शुभता प्राप्त
करने के लिए मन्दिर,मस्जिद, गुरुद्धारा, शमशान या
आम जनता के लिए प्याउ( पानी की टंकी ) बनवाए
या किसी मिटटी के बर्तन में चिड़ियों के लिये
पानी रखे .
—-चन्द्र का वैदिक मंत्र :-
चंद्रमा के शुभ प्रभाव प्राप्त करने हेतु चंद्रमा के
वैदिक मंत्र का 11000 जप करना चाहिए।.
—–”””ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः “””या “””ऊँ
सों सोमाय नमः “”
—-चन्द्र दोष दूर करने के लिए सोमवार, अमावस्या
का दिन बहुत ही शुभ होता है। किंतु चन्द्र दोष से
पीडि़त के लिए चन्द्रग्रहण के दौरान चन्द्र उपासना
बहुत ही जरूरी होती है। शिव जी की आराधना करें।
अपने श्री इष्ट देवताये नम:, का जाप करे….
इस चंद्रग्रहण पर करें यह प्रयोग, बिजनेस में जरुर
मिलेगी सफलता—-
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार यदि आपका बिजनेस ठीक नहीं चल रहा है
तो घबराईए बिल्कुल मत क्यों की चन्द्र ग्रहण 04
अप्रेल,2015 (शनिवार) को को आने वाला चंद्र ग्रहण
इस समस्या से छुटकारा पाने का श्रेष्ठ अवसर है।
बिजनेस की सफलता के लिए चंद्रग्रहण के दिन यह
प्रयोग करें-
ऐसे करें प्रयोग—–
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार चन्द्र ग्रहण 04 अप्रेल,2015 (शनिवार) को
ग्रहण से पहले नहाकर लाल या सफेद कपड़े पहन लें।
इसके बाद ऊन व रेशम से बने आसन को बिछाकर उत्तर
दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। जब ग्रहण काल
प्रारंभ हो तब चमेली के तेल का दीपक जला लें। अब
दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला लें तथा बाएं हाथ में
5 गोमती चक्र लेकर नीचे लिखे मंत्र का 54 बार जप
करें-
—-मन्त्र “”””ऊँ कीली कीली स्वाहा”””
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार अब इन गोमती चक्रों को एक डिब्बी में
डाल दें और फिर क्रमश: 5 हकीक के दाने व 5 मूंगे के
दाने लेकर पुन: इस मंत्र का 54 बार उच्चारण करें। अब
इन्हें भी एक डिब्बी में डालकर उसके ऊपर सिंदूर भर
दें। अब दीपक को बुझाकर उसका तेल भी इस डिब्बी
में डाल दें।
इस डिब्बी को बंद करके अपने घर, दुकान या ऑफिस
में रखें। आपका बिजनेस चल निकलेगा।
—-इस चंद्रग्रहण पर करें यह उपाय/टोटका, होगा
अचानक धन लाभ—-
चन्द्र ग्रहण 04 अप्रेल,2015 (शनिवार) को तंत्र
शास्त्र के अनुसार ग्रहण के दौरान किया गया
प्रयोग बहुत प्रभावशाली होता है और इसका फल
भी जल्दी ही प्राप्त होता है। इस मौके का लाभ
उठाकर यदि आप धनवान होना चाहते हैं तो नीचे
लिखा उपाय करने से आपकी मनोकामना शीघ्र ही
पूरी होगी और आपको अचानक धन लाभ होगा।
ऐसे करें उपाय/टोटका —-
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार चन्द्र ग्रहण 04 अप्रेल,2015 (शनिवार) को
ग्रहण के पूर्व नहाकर साफ पीले रंग के कपड़े पहन लें।
ग्रहण काल शुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके
ऊन या कुश के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने पटिए
(बाजोट या चौकी) पर एक थाली में केसर का
स्वस्तिक या ऊँ बनाकर उस पर महालक्ष्मी यंत्र
स्थापित करें। इसके बाद उसके सामने एक दिव्य शंख
थाली में स्थापित करें।अब थोड़े से चावल को केसर में
रंगकर दिव्य शंख में डालें। घी का दीपक जलाकर नीचे
लिखे मंत्र का कमलगट्टे की माला से ग्यारह माला
जप करें-
ये हें मंत्र—-
सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि मुक्ति मुक्ति प्रदायिनी।
मंत्र पुते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।।
पंडित दयानंद शास्त्री ( मोब.–09669290067) के
अनुसार मंत्र जप के बाद इस पूरी पूजन सामग्री को
किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। इस
प्रयोग से कुछ ही दिनों में आपको अचानक धन लाभ
होगा।
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जानिए कुंडली के अनिष्ट ग्रहण योग—
हमारे ज्योतिष शास्त्रों ने चंद्रमा को चौथे घर का
कारक माना है. यह कर्क राशी का स्वामी है. चन्द्र
ग्रह से वाहन का सुख सम्पति का सुख विशेष रूप से
माता और दादी का सुख और घर का रूपया पैसा और
मकान आदि सुख देखा जाता है. चंद्रमा दुसरे भाव में
शुभ फल देता है और अष्टम भाव में अशुभ फल देता है.
चन्द्र ग्रह वृषव राशी में उच्च और वृश्चक राशी में
नीच का होता है. जन्म कुंडली में यदि चन्द्र राहू या
केतु के साथ आ जाये तो वे शुभ फल नहीं देता
है.ज्योतिष ने इसे चन्द्र ग्रहण माना है, यदि जन्म
कुंडली में ऐसा योग हो तो चंद्रमा से सम्बंधित सभी
फल नष्ट हो जाते है माता को कष्ट मिलता है घर में
शांति का वातावरण नहीं रहता जमीन और मकान
सम्बन्धी समस्या आती है.
ग्रहण दोष —
ग्रहण योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में
बनने वाला एक अशुभ योग माना जाता है जिसका
किसी कुंडली में निर्माण जातक के जीवन के
विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं पैदा कर सकता है।
वैदिक ज्योतिष में ग्रहण योग की प्रचलित
परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में सूर्य
अथवा चन्द्रमा के साथ राहु अथवा केतु में से कोई
एक स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में ग्रहण योग बन
जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि
किसी कुंडली में यदि सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु
अथवा केतु में से किसी ग्रह का दृष्टि आदि से भी
प्रभाव पड़ता हो, तब भी कुंडली में ग्रहण योग बन
जाता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि
किसी कुंडली में सूर्य अथवा चन्द्रमा पर राहु अथवा
केतु का स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो
कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो
जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न
भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है।
सामान्यतः ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है अपनाना
,धारण करना ,मान जाना आदि .ज्योतिष में जब
इसका उल्लेख आता है तो सामान्य रूप से हम इसे सूर्य
व चन्द्र देव का किसी प्रकार से राहु व केतु से
प्रभावित होना मानते हैं . .पौराणिक कथाओं के
अनुसार अमृत के बंटवारे के समय एक दानव धोखे से
अमृत का पान कर गया .सूर्य व चन्द्र की दृष्टी उस पर
पड़ी और उन्होंने मोहिनी रूप धरे विष्णु जी को संकेत
कर दिया ,जिन्होंने तत्काल अपने चक्र से उसका
सिर धड़ से अलग कर दिया .इस प्रकार राहु व केतु दो
आकृतियों का जन्म हो गया . अब राहु व केतु के बारे
में एक नयी दृष्टी से सोचने का प्रयास करें .राहु इस
क्रम में वो ग्रह बन जाता है जिस के पास मात्र सिर
है ,व केतु वह जिसके अधिकार में मात्र धड़ है .स्पष्ट
कर दूं की मेरी नजर में ग्रहण दोष वहीँ तक है जहाँ
राहु सूर्य से युति कर रहे हैं व केतु चंद्रमा से .इस में भी
जब दोनों ग्रह एक ही अंश -कला -विकला पर हैं तब
ही उस समय विशेष पर जन्म लेने वाला जातक वास्तव
में ग्रहण दोष से पीड़ित है
अगर आकड़ों की करें तो राहु केतु एक राशि का भोग
१८ महीनो तक करते हैं .सूर्य एक माह एक राशि पर
रहते हैं .इस हिसाब से वर्ष भर में जब जब सूर्य राहु व
केतु एक साथ पूरा एक एक महीना रहेंगे तब तब उस
समय विशेष में जन्मे जातकों की कुंडली ग्रहण दोष से
पीड़ित होगी .इसी में चंद्रमा को भी जोड़ लें तो
एक माह में लगभग चन्द्र पांच दिन ग्रहण दोष बनायेंगे
.वर्ष भर में साठ दिन हो गए .यानी कुल मिलाकर
वर्ष भर में चार महीने तो ग्रहण दोष हो ही जाता है
—ज्योतिषीय विचारधारा के अनुसार चन्द्र ग्रहण
योग की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस
करता है,चिडचिडापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन
जाता है,माँ के सुख में कमी आती है, कार्य को शुरू
करने के बाद उसे अधूरा छोड़ देना लक्षण हैं,
फोबिया,मानसिक बीमारी, डिप्रेसन
,सिज्रेफेनिया,इसी योग के कारण माने गए हैं,
मिर्गी ,चक्कर व मानसिक संतुलन खोने का डर भी
होता है.
—-चन्द्र+केतु ,सूर्य+राहू ग्रहण योग बनाते है..इसी
प्रकार जब चंद्रमा की युति राहु या केतु से हो
जाती है तो जातक लोगों से छुपाकर अपनी
दिनचर्या में काम करने लगता है . किसी पर भी
विश्वास करना उसके लिए भारी हो जाता है .मन में
सदा शंका लिए ऐसा जातक कभी डाक्टरों तो
कभी पण्डे पुजारियों के चक्कर काटने लगता है .अपने
पेट के अन्दर हर वक्त उसे जलन या वायु गोला फंसता
हुआ लगता हैं .डर -घबराहट ,बेचैनी हर पल उसे घेरे रहती
है .हर पल किसी अनिष्ट की आशंका से उसका ह्रदय
कांपता रहता है .भावनाओं से सम्बंधित
,मनोविज्ञान से सम्बंधित ,चक्कर व अन्य किसी
प्रकार के रोग इसी योग के कारण माने जाते हैं .
चंद्रमा यदि अधिक दूषित हो जाता है तो मिर्गी
,पागलपन ,डिप्रेसन,आत्महत्या आदि के कारकों का
जन्म होने लगता हैं .चंद्रमा भावनाओं का
प्रतिनिधि ग्रह होता है .इसकी राहु से युति जातक
को अपराधिक प्रवृति देने में सक्षम होती है ,विशेष
रूप से ऐसे अपराध जिसमें क्षणिक उग्र मानसिकता
कारक बनती है . जैसे किसी को जान से मार देना ,
लूटपाट करना ,बलात्कार आदि .वहीँ केतु से युति डर
के साथ किये अपराधों को जन्म देती है . जैसे छोटी
मोटी चोरी .ये कार्य छुप कर होते है,किन्तु पहले
वाले गुनाह बस भावेश में खुले आम हो जाते हैं ,उनके
लिए किसी ख़ास नियम की जरुरत नहीं होती .यही
भावनाओं के ग्रह चन्द्र के साथ राहु -केतु की युति
का फर्क होता है. ध्यान दीजिये की राहु आद्रा -
स्वाति -शतभिषा इन तीनो का आधिपत्य रखता है
,ये तीनो ही नक्षत्र स्वयं जातक के लिए ही चिंताएं
प्रदान करते हैं किन्तु केतु से सम्बंधित नक्षत्र
अश्विनी -मघा -मूल दूसरों के लिए भी भारी माने
गए हैं .राहु चन्द्र की युति गुस्से का कारण बनती है
तो चन्द्र – केतु जलन का कारण बनती है .(यहाँ
कुंडली में लग्नेश की स्थिति व कारक होकर गुरु का
लग्न को प्रभावित करना समीकरणों में फर्क उत्पन्न
करने में सक्षम है).जिस जातक की कुंडली में दोनों
ग्रह ग्रहण दोष बना रहे हों वो सामान्य जीवन
व्यतीत नहीं कर पाता ,ये निश्चित है .कई उतार-
चड़ाव अपने जीवन में उसे देखने होते हैं .मनुष्य जीवन के
पहले दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रहों का दूषित होना
वास्तव में दुखदायी हो जाता है .ध्यान दें की सूर्य -
चन्द्र के आधिपत्य में एक एक ही राशि है व ये कभी
वक्री नहीं होते . अर्थात हर जातक के जीवन में
इनका एक निश्चित रोल होता है .अन्य ग्रह कारक-
अकारक ,शुभ -अशुभ हो सकते हैं किन्तु सूर्य -चन्द्र
सदा कारक व शुभ ही होते हैं .अतः इनका प्रभावित
होना मनुष्य के लिए कई प्रकार की दुश्वारियों का
कारण बनता है
जानिए ग्रहण योग के लक्षण—
—दूसरो को दोष देने की आदत
— वाणी दोष से सम्बन्ध ख़राब होते जाते है ,सम्बन्ध
नहीं बचते
—-सप्तम भाव का दोष marriage सुख नहीं देता
—प्रथम द्वितीय नवम भाव में बनने वाले दोष भाग्य
कमजोर कर देते है ,बहुत ख़राब कर देते है लाइफ में हर
चीज़ संघर्ष से बनती है या संघर्ष से मिलती है ,
—मन हमेशा नकारात्मक रहता है ,
—हमेशा आदमी depression में रहता है,
–कभी भी ऐसे आदमी को रोग मुक्त नहीं कहा जा
सकता
–पैरो में दर्द होना , दूसरे को दोष देना ,खाने में बल
निकलते है ,
—उपाय —
—त्रयोदशी को रुद्राभिषेक करे specially शुक्ल पक्ष
की त्रयोदशी को
—खीरा कब्ज दूर करता है ,liver मजबूत करता है ,पित्त
रोग में फायदा करता है ,जो लोग FAT कम करना
चाहे उनको फायदा करता है, किडनी problems में
फायदा करता है
–ग्रहण योग वाले आदमी के पास काफी उर्जा
होती है यदि वो उसे +वे कर ले तो जीवन में अच्छी
खासी सफलता मिल जाती है
–ग्रहण योग के लक्षण—
—-घर में अचानक आग लग जाये या चोरी हो जाये
—12th house में चंद्रमा after marriage गरीबी दे
देगा
जानिए ग्रहण योगो को +ve करने का तरीका—
—गुरु के सानिध्य में रहे ,
—-मंदिर आते जाते रहे ,
—हल्दी खाते रहे ,
—-गाय के सानिध्य में रहे ,
—सूर्य क्रिया एवं चन्द्र क्रिया दोनों नियमित करे ,
—घर के पश्चिमी हिस्से की सफाई करे ,मंगल वार
शनिवार को श्रम दान करे ,
—-चांदी का चौकोर टुकड़ा अपनी जेब में रखे यदि
माँ के हाथ से मिला हो तो और भी अच्छा है ,
—संपत्ति अपने नाम से न रखे किसी और को पार्टनर
बना ले या किसी और के नाम पे रख दे ,
—-कुत्ते की सेवा करे पैसा किसी शुभ काम में खर्च
करे ,
किसी जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रहण योग निवारण का
एक आसान उपाय ( इसे ग्रहण काल के मध्य में करे)—
1 किलो जौ दूध में धोकर और एक सुखा नारियल
चलते पानी में बहायें और 1 किलो चावल मंदिर में
चढ़ा दे, अगर चन्द्र राहू के साथ है और यदि चन्द्र केतु
के साथ है तो चूना पत्थर ले Gउसे एक भूरे कपडे में बांध
कर पानी में बहा दे और एक लाल तिकोना झंडा
किसी मंदिर में चढ़ा दे.

साभार-

"विनायक वास्तु टाईम्स" https://vinayakvaastutimes.wordpress.com/


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