Question to osho भगवान, मैं एक युवती के प्रेम में था। वह मुझे धोखा दे गई और किसी और की हो गई। अब मैं जी तो रहा हूं, किंतु जीने का कोई रस न रहा। मैं क्या करूं?

Question to osho - भगवान, मैं एक युवती के प्रेम में था। वह मुझे धोखा दे गई और किसी और की हो गई। अब मैं जी तो रहा हूं, किंतु जीने का कोई रस न रहा। मैं क्या करूं?

प्रेम में थे या स्त्री पर कब्जा करने की आकांक्षा में थे? क्योंकि तुम्हारी भाषा कहती है कि वह मुझे धोखा दे गई और किसी और की हो गई! प्रेम को इससे क्या फर्क पड़ता है! अगर वह युवती किसी और के साथ ज्यादा सुखी है, तो तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए। क्योंकि प्रेम तो यही चाहता है कि जिसे हम प्रेम करते हैं, वह ज्यादा सुखी हो, वह आनंदित हो। अगर वह युवती तुम्हारे बजाय किसी और के पास ज्यादा आनंदित है, तो इसमें रस खो देने का कहां कारण है!प्रेम में थे या स्त्री पर कब्जा करने की आकांक्षा में थे? क्योंकि तुम्हारी भाषा कहती है कि वह मुझे धोखा दे गई और किसी और की हो गई! प्रेम को इससे क्या फर्क पड़ता है! अगर वह युवती किसी और के साथ ज्यादा सुखी है, तो तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए। क्योंकि प्रेम तो यही चाहता है कि जिसे हम प्रेम करते हैं, वह ज्यादा सुखी हो, वह आनंदित हो। अगर वह युवती तुम्हारे बजाय किसी और के पास ज्यादा आनंदित है, तो इसमें रस खो देने का कहां कारण है!मगर हम प्रेम वगैरह नहीं करते। प्रेम के नाम पर हम कुछ और करते हैं--कब्जा--मालकियत। तुम पति होना चाहते थे। पति यानी स्वामी। और वह किसी और की हो गई!
और मजा यह है कि तुम्हें उससे प्रेम था। तुमने अपने प्रश्न में यह तो बताया ही नहीं कि उसे भी तुमसे प्रेम था या नहीं। तुम से होता, तो तुम्हारे साथ होती। तुम्हें प्रेम था, इससे जरूरी तो नहीं कि उसे भी प्रेम हो। प्रेम कोई जबर्दस्ती तो नहीं। तुम्हें था, यह तुम्हारी मर्जी। और उसे नहीं था, तो उसकी भी तो आत्मा है, उसकी भी तो स्वतंत्रता है। अब किसी को किसी से प्रेम हो जाए और दूसरे को प्रत्युत्तर देना न हो, तो कोई जबर्दस्ती तो नहीं है।
तुम प्रेम करने को स्वतंत्र हो, लेकिन किसी के मालिक होने को स्वतंत्र नहीं हो। तुम किसी के जीवन पर छा जाना चाहो, हावी होना चाहो, यह तो अहंकार है--प्रेम नहीं है। प्रेम जानता है--स्वतंत्रता देना।
खुश होओ कि अगर वह कहीं भी है और प्रसन्न है।...यही तो तुम चाहते थे कि वह प्रसन्न हो जाए। लेकिन नहीं। शायद तुम यह नहीं चाहते थे। तुम चाहते थे कि वह तुम्हारी छाया बन कर चले। तुम्हारे अहंकार की तृप्ति हो। वह तुम्हारा आभूषण बने। तुम दुनिया को कह सको कि देखो, मैंने इस युवती को जीत लिया! वह तुम्हारी विजय का प्रतीक बने, पताका बने। यह तुम्हारे अहंकार का ही आयोजन था। और अहंकार जहां है, वहां प्रेम नहीं है।
और शायद इसी अहंकार के कारण वह किसी और की हो गई हो। समझदार रही होगी। अच्छा किया--किसी और की हो गई। तुम्हारी होती, तुम सताते। तुम्हारा अहंकार बता रहा है कि तुम उसकी छाती पर पत्थर बन कर बैठ जाते।
अब तुम कह रहे हो, अब मैं जी तो रहा हूं, किंतु जीने का कोई रस न रहा। युवती को देखा था, उसके पहले जीते थे कि नहीं? तब रस था कि नहीं? तो अब क्या बिगड़ गया! जैसे पहले जीते थे बिना युवती के; युवती को जाना नहीं था, तब भी तो जीते थे न!
मेरे पास लोग आ कर पूछते हैं कि हमें बड़ा डर लगता है कि मरने के बाद क्या होगा? मैं उनसे कहता हूं कि जन्म से पहले का तुम्हें कुछ डर लगता है? तुम थे या नहीं--कुछ पता है? वे कहते हैं, कुछ पता नहीं।
कुछ हर्जा है नहीं थे तो? उन्होंने कहा, क्या हर्जा है! जब पता ही नहीं, तो रहे हों या न रहे हों। मैंने कहा, तो बस यही मौत के बाद होगा, जो जन्म के पहले था। इसलिए घबड़ाहट क्या है!
जन्म के पहले का तुम्हें कुछ पता नहीं है; मौत के बाद का भी तुम्हें कुछ पता नहीं होगा। तो चिंता क्या कर रहे हो!
युवती नहीं मिली थी, उसके पहले भी तुम जिंदा थे--और बड़ा रस था। और युवती को देखकर सारा रस खो गया! ऐसे गुलाम हो? और कल का तो भरोसा रखो--कल कहीं फिर कोई दूसरी युवती मिल जाए--उससे भी सुंदर, उससे भी आकर्षक--तो तुम परमात्मा को धन्यवाद दोगे कि अच्छा हुआ कि उस बाई से छुटकारा हो गया!
मुल्ला नसरुद्दीन अपनी पत्नी के साथ जा रहा था। एक सुंदर स्त्री पास से गुजरी। खटक गई; आंख में अटक गई। पत्नी तो ऐसी चीजें एकदम से पहचान लेती हैं।
पत्नी ने फौरन मुल्ला से कहा कि ऐसी सुंदर स्त्री को देखकर तुम्हें जरूर भूल ही जाता होगा कि तुम विवाहित हो!
मुल्ला ने कहा कि नहीं; नहीं फजूल की मां! ऐसी स्त्रियों को देखकर ही मुझे याद आता है कि अरे, मैं विवाहित हूं! हाय राम, मैं विवाहित हूं! ऐसी स्त्रियों को देखकर ही याद आता है।
कल का भरोसा रखो। अगर बीते कल में धोखा खा गए थे, तो आने वाले कल में भी धोखा फिर खाओगे। ऐसी क्या जल्दी पड़ी है!
और पूछते हो, जीवन में कोई रस नहीं रहा। अब मैं क्या करूं? अगर इस तरह ही रस आता हो, तो फिर कोई तलाश कर लो। युवतियों की कोई कमी है! पृथ्वी भरी पड़ी है। लेकिन अगर कुछ समझ की बात करनी हो, तो थोड़ा सोचो।
तुमने बच्चों की कहानियां पढ़ी होंगी। बच्चों की कहानियों में यूं कहानियां आती हैं कि कोई राजा है उसके प्राण उसने तोते में रख दिए। इससे उसको कोई मार नहीं सकता। जब तक तोते को न मारे, राजा को नहीं मार सकता। राजा को कितना ही मारो, मरता ही नहीं। उसने प्राण अपने तोते में छिपा रखे हैं। जब तोते को पकड़ कर मार डालोगे, तो राजा मर जाएगा।
ये कहानियां बड़ी ठीक हैं। अब यह तो यूं हुआ कि तुमने अपने प्राण उस लड़की में रख दिए। इतने जल्दी गिरवी रख दिए! हर किसी के हाथ में दे देते हो प्राण!
जीवन का रस ही चला गया। ज्यादा कुछ रहा नहीं होगा रस। भ्रांति में हो तुम कि रस था। ऐसे कहीं रस जाता है? रस को तुम जानते ही नहीं कि रस क्या है। जिन्होंने जाना है, उन्होंने कहा है--रसो वै सः। उन्होंने तो परमात्मा की परिभाषा को है कि वह रस है। उन्होंने तो सिर्फ परमात्मा को ही रस माना है; और किसी चीज का कोई रस नहीं है।
मिल जाती स्त्री, तो भी रस खो जाता। और स्त्री गले से बंध जाती--सो अलग! फिर उससे छूटना मुश्किल हो जाता। जरा तुम उससे भी तो पूछो, जिसके गले बंध गई है! उसकी क्या हालत है! उसका भी तो बेचारे का दुख-दर्द जानो। उसका दुख-दर्द जान कर तुमको बड़ी सांत्वना मिलेगी, बड़ा आश्वासन मिलेगा।
एक पागलखाने में एक राजनेता देखने गया था पागलखाने को। एक आदमी अपने बाल लोंच रहा था। छाती पीट रहा था। और हाथ में एक तस्वीर लिए था। आंखों से आंसू बह रहे थे--झर-झर! छाती से लगाता था तस्वीर को। सींखचों में बंद था। पूछा उसने सुपरिंटेंडेंट को, इस आदमी को क्या हो गया! यह क्या कर रहा है? यह तस्वीर किसकी है?
उसने कहा, यह तस्वीर एक स्त्री की है, जिसको यह पाना चाहता था और नहीं पा सका। जब से नहीं पाया, पागल हो गया है। (रहा होगा नगेंद्र जैसा!) बस, अब तब से यह बस बाल लोंचता है। रोता है। छाती से फोटो लगाता है। चीख-पुकार मचाता है। इसको पागलखाने में रखना पड़ा है। इसके घर के लोग परेशान हो गए। इसने सब का चैन हराम कर दिया है।
राजनेता ने कहा, बेचारा!
आगे बढ़े। दूसरे कटघरे में एक आदमी सींखचों को पकड़-पकड़ कर हिला रहा था। सींखचों से सिर मार रहा था। लहूलुहान हो रहा था उसका सिर। पूछा, इसको क्या हो गया? इस बेचारे को क्या हो गया?
उस सुपरिंटेंडेंट ने कहा कि अब आप न पूछो, तो अच्छा। इसने उस लड़की से शादी कर ली, जिस लड़की की याद में पहला मरा जा रहा है। जब से इसने शादी की है, तब से इसकी यह हालत हो गई! तब से यह सींखचों से सिर मारता है! दीवालों से सिर फोड़ता है। यह आत्महत्या करने को उतारू है। यह आत्महत्या न कर ले, इसलिए इसको पागलखाने में रखना पड़ा है।
किसको बेचारा कहोगे? वह, जिसको नहीं मिली स्त्री--वह। या जिसको मिल गई--वह? किसके जीवन में रस है?
तुम जरा उनको तो देखो, जिसको उनकी प्रेयसियां मिल गई हैं; उनके प्रेमी मिल गए हैं। उन पर तो जरा नजर डालो। वहां कहां रस है? ऊबे बैठे हैं। जब भी तुम किसी जोड़े को उदास देखो, समझना--विवाहित हैं। जब भी तुम किसी स्त्री-पुरुष को लड़ते देखो, समझो विवाहित हैं। एक-दूसरे की गर्दन को दबाते देखो--समझो कि विवाहित हैं!
जरा देखो तो चारों तरफ आंख खोल कर। तुम मुझसे कुछ रहे हो, अब मैं जी तो रहा हूं, किंतु जीने का कोई रस न रहा। इतने जल्दी गंवा दोगे जीवन का रस! जीवन कुछ और बड़े काम के लिए है। जीवन कुछ और विराट आकाश को पाने के लिए है। अभी और भी मंजिलें हैं। अभी और भी आसमान हैं।
दिल के सहरा में कोई आस का जुगनू भी नहीं।
इतना रोया हूं कि अब आंख में आंसू भी नहीं।।
कासाए-दर्द लिए फिरती है गुलशन की हवा।
मेरे दामन में तिरे प्यार की खुशबू भी नहीं।।
छिन गया मेरी निगाहों से भी एहसासे-जमाल।
तेरी तस्वीर में पहला सा वो जादू भी नहीं।।
मौज-दर-मौज तेरे गम की शफक खिलती है।
मुझे इस सिलसिलाए-रंग पे काबू भी नहीं।।
दिल वो कमबख्त कि धड़के ही चला जाता है।
ये अलग बात कि तू जीनते पहलू भी नहीं।।
ये अजब राहगुजर है कि चट्टानें तो बहुत।
और सहारे को तेरी याद के बाजू भी नहीं।।
जल्दी ही भूल जाओगे। फिर उलझोगे और भूल जाओगे। अभी लगता है कि
दिल के सहारा में कोई आस का जुगनू भी नहीं।
इतना रोया हूं कि अब आंख में आंसू भी नहीं।।
लेकिन यह सब रोना-धोना, यह आशाओं का बुझ जाना, यह जुगनुओं का भी खो जाना, ज्यादा देर नहीं टिकेगा। आदमी भ्रम पालन में बड़ा कुशल है। जरा रुको। फिर भ्रम पालोगे।
एक भरम टूटता नहीं कि दूसरा भरम हम पैदा कर लेते हैं! फिर से रस की धार बहने लगेगी! हालांकि वह रस की धार बिलकुल झूठी है। रसधार तो बहती है सिर्फ उसके जीवन में, जो परमात्मा के प्रेम से भर जाता है। इन छोटे-मोटे प्रेमों में प्रेम नहीं है; आसक्तियां हैं। प्रेम के धोखे हैं। प्रेम केवल शब्द है--प्यारा शब्द। लेकिन शब्द को उघाड़ कर देखो, तो भीतर कुछ भी लहीं। कोई अर्थ नहीं। कोई गौरव नहीं, कोई गरिमा नहीं। कोई काव्य नहीं, कोई संगीत नहीं।
अब तलक मुझ सी किसी पर भी नहीं गुजरी है
मैं बहारों में जला और किनारों में बहा,
मैंने हर आंख में ढूंढा है प्यार अपने लिए
दिल मेरा प्यार भरा प्यारा का भूखा ही रहा।
जिंदगी मेरी सिसकती रहेगी क्या यूं ही
क्या मुझे कोई सहारा न मिल सकेगा कभी?
बहारें देखती हैं मुड़ के मगर रुकती नहीं,
कोई भी फूल क्या मेरा न खिल सकेगा कभी?
इससे बढ़ कर के भला और क्या है मजबूरी
अपने अरमानों की लाशों पर मुझे चलना पड़ा,
छिपाता आया हूं जिसको मैं बड़ी मुद्दत से
आज सब के ही सामने वह राज कहना पड़ा।
अब तलक मुझ सी किसी पर भी नहीं गुजरी है
मैं बहारों में जला और किनारों में बहा,
मैंने हर आंख में ढूंढा है प्यार अपने लिए
दिल मेरा प्यार भरा प्यार का भूखा ही रहा।
इस जगत में तुम अगर प्रेम को खोज रहे हो, तो यह ऐसा ही है, जैसे कोई रेत से तेल को निचोड़ने की कोशिश कर रहो हो--जो नहीं है वहां।
तुम किससे प्रेम मांग रहे हो? यह भी तो देखो कि तुम जिससे प्रेम मांग रहे हो, वह भी तुमसे प्रेम मांग रहा है! न उसके पास है, न तुम्हारे पास है। यहां हर कोई हर किसी से मांग रहा है। और सब भिखमंगे हैं। तुम भी चाहते हो, दूसरा प्रेम दे। और दूसरा भी चाहता है कि तुम प्रेम दो। और दोनों को इसकी फिक्र नहीं है कि है भी किसी के पास, जो दे दे?
पहले होना तो चाहिए--देने के पहले होना चाहिए। इसलिए तो यहां हर व्यक्ति हारा हुआ है, थका हुआ है, परेशान है, पीड़ित है। कोई तुम्हीं नहीं।
समझो। इस मौके को चूको मत। बड़ी कृपा की उस युवती ने, जो किसी और की हो गई। तुम पर उसकी दया है, अनुकंपा है। उसने बड़ा प्रेम जतलाया तुम्हारे प्रति। एक अवसर दिया तुम्हें देखने का।
तुम मांग रहे थे प्रेम। मगर तुम्हारे पास है? जिसके पास है, वह मांगता नहीं; वह देता है। और जिसके पास नहीं है, वह मांगता है।
और किससे मांग रहे हो? जिसके पास हो, उससे मांगो। और प्रेम का झरना किसके पास होता है? जिसके पास ध्यान--उसके पास प्रेम। बिना ध्यान के प्रेम नहीं।
ध्यान की छाया है प्रेम। ध्यान का फूल है प्रेम। बुद्धों के पास प्रेम होता है। उनसे मांगो। मत मांगो, तो भी वे देते हैं। झोली फैलाओ--मत फैलाओ--तो भी बरस जाते हैं।
जहां रोशनी है, वहां जाओगे, तो रोशनी तुम पर पड़ेगी ही। तुम्हारे मांगने, न मांगने का सवाल नहीं। फूल खिलेगा, उसके पास से गुजरोगे--गंध मिलेगी। मांगने न मांगने का कोई सवाल ही नहीं है।
लेकिन इस जगत में बड़ी अजीब हालत चल रही है। भिखमंगे भिखमंगों के सामने भिक्षापात्र लिए खड़े हैं कि कुछ दे दो! बाबा, कुछ मिल जाए! और दूसरा भी मांग रहा है। और दोनों इस भ्रांति में हैं कि दूसरे के पास होगा। किसी के पास नहीं है।
सिर्फ उन थोड़े-से लोगों के पास प्रेम होता है, जिन्होंने ध्यान की अंतिम गहराइयां छुई हैं। प्रेम परिणाम है ध्यान का।
और मजा यह है कि ध्यानी किसी से प्रेम नहीं मांगता; देता है; सिर्फ देता है--मांगता ही नहीं।
और यह भी तुम समझ लेना--यह जीवन का महागणित--कि जो देता है, उसे बहुत मिलता है। हालांकि वह मांगता नहीं। वह छांट-छांट कर भी नहीं देता। वह सिर्फ बांटता ही रहता है। और उस पर बहुत बरसता है। आकाश से बरसता है। बादलों से बरसता है। चांदत्तारों से बरसता है। परमात्मा उसे चारों तरफ से भर देता है। वह लुटाए चला जाता है; परमात्मा उसे दिए चला जाता है!
रसो वै सः। परमात्मा रस-रूप है। लेकिन किसको परमात्मा मिला है? जो भीतर जागा है; जिसने भीतर सारी तंद्रा और नींद तोड़ दी है; जिसने भीतर बेहोशी की सारी परतें उखाड़ फेंकी हैं; जिसने मूर्च्छा को जड़ों से उखाड़ दिया है; जिसने भीतर रोशन कर लिया अपने को; जो प्रकाशित हो गया है--उसके भीतर परमात्मा उतर आता है। रस की धार बह जाती है।
नगेंद्र! तुम जिस ढंग से सोच रहे हो, उसका तो अंतिम परिणाम आत्महत्या है। मैं जो कह रहा हूं, उसका अंतिम परिणाम आत्मरूपांतरण है। और इसको भी तुमसे कह दूं कि आत्महत्या के क्षण में ही आत्मरूपांतरण की संभावना है, क्योंकि जब आदमी ऐसी जगह आ जाता है, जहां आगे चलने को कोई जगह नहीं रह जाती, रास्ता खतम हो जाता है--वहीं क्रांति घटती है। नहीं तो क्रांति नहीं घटती।
इस अवसर को चूकना मत। यह अवसर है कि तुम जागो।
और प्रेम की जगह ध्यान पर दृष्टि जमाओ। प्रेम धोखा दे गया। देने ही वाला था। क्योंकि था ही नहीं। ध्यान ने कभी किसी को धोखा नहीं दिया है। आज तक नहीं दिया है। जिसने भी ध्यान की तरफ नजर उठाई--मालामाल हो गया है। सम्राट हो गया है।
और मजा यह है कि उसकी संपदा में प्रेम की संपदा भी आती है।
भीतर झांको, वहां प्रभु का राज्य है। अपने पर आओ। प्रेम कहता है--दूसरे को पकड़ो। ध्यान कहता है--अपने को पकड़ो। इसलिए ऊपर से तो प्रेम और ध्यान के रास्ते बिलकुल विपरीत मालूम पड़ते हैं। और हैं भी विपरीत।
तुम्हारे प्रेम से तो ध्यान का रास्ता बिलकुल विपरीत है। अब तुम्हारी नजर उस युवती पर अटकी है। दूसरे पर अटकी है। यह भी कोई बात हुई! पहले अपने को तो खोज लो। फिर दूसरे की तलाश में जाना। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम अपने को खोज लो, तो दूसरे तुम्हारी तलाश में आएंगे। तुम्हें कहीं किसी की तलाश में जाना न पड़ेगा।
तुम दैदीप्यमान हो उठो, तो तुम्हारी किरणें दूसरों को बुला लाएंगी। दूर-दूर से लोग चले आएंगे--तुम्हारे झरने पर पानी पीने; अपनी प्यास बुझाने।
कुछ ऐसा करो कि तुम्हें तो रस मिले ही मिले--औरों को भी रस मिल जाए। कुछ ऐसा करो कि परमात्मा तुमसे बह उठे।
और जब आदमी ऐसी जगह आ जाता है, जहां सोचने लगता है कि अब खतम ही कर लूं अपने को...। जरूर तुमने सोचा होगा बहुत बार कि अब अपने को मिटा ही लूं, क्योंकि अब जीवन तो है ही नहीं। रस नहीं है। जीए जा रहा हूं। क्या सार है जीने में! खतम ही क्यों न कर लूं?
जब खतम करने तक की तैयारी हो, तो इसके पहले एक काम और कर लो, फिर खतम कर लेना। इसके पहले एक काम यह तो कर लो--जान तो लो कि मैं कौन हूं। फिर आत्महत्या करनी हो, तो आत्महत्या कर लेना। हालांकि जिसने अपने को जाना है, उसने कभी आत्महत्या नहीं की है। क्योंकि वह तो जानता है--आत्महत्या हो ही नहीं सकती। आत्मा अमर है। मिटाओ तो भी मिट नहीं सकती। जलाओ, तो भी जल नहीं सकती।
और इस शाश्वत को पहचानते ही अपूर्व घटनाएं घटती है। चमत्कार घटते हैं। जादू जीवन में आ जाता है। तुम मिट्टी छुओ और सोना हो जाएगी। तुम कांटा छुओगे और फूल हो जाएगा। यह सारा अस्तित्व परमात्मा से जगमगा उठता है।
तुम जगमगा जाओ भीतर, तो बाहर दीए ही दीए जल जाते हैं। जल ही रहे हैं। सिर्फ तुम अंधे हो, इसलिए दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। और चारों तरफ से रस तुम्हारी तरफ बहने लगता है। तुम बहो--फिर देखो।
यह संकट की घड़ी है, इसका उपयोग कर लो। मेरे हिसाब से संकट की घड़ियां बड़े सौभाग्य की घड़ियां होती हैं। समझदार उनको वरदान बना लेते हैं। नासमझ--उनको अभिशाप। सब तुम पर निर्भर है।
आज इतना ही। - ओशो शरनम् गच्छामि".....

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