osho क्या आप ईश्वर में विशवास करते है

मैं एक महानगरी में था! वहां कुछ युवक मिलने आए! वे
पूछने लगे: "क्या आप ईश्वर में विशवास करते है?" मैंने
कहा: "नहीं! विशवास का और ईश्वर का क्या संबंध?
मैं तो ईशवर को जनता हूं!" फिर मैंने एक कहानी कही!
किसी देश में क्रांति हो गई थी! वहां के
क्रांतिकारी सभी कुछ बदलने में लगे थे! धर्म को भी वे
नष्ट करने पर उतारूं थे! उसी सिलसिले में एक वृद्ध
फ़क़ीर को पकड़ कर अदालत में लाया गया! उस फ़क़ीर
से उन्होंने पूछा: "ईश्वर में क्यों विश्वास करते हो?" वह
फ़क़ीर बोला: "महानुभाव, विशवास मैं नहीं करता!
लेकिन, ईश्वर है! अब मैं क्या करूं?" उन्होंने पूछा: "यह
तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि ईश्वर है?" वह बूढ़ा बोला:
"आंखें खोलकर जब से देखा, तब से उसके अतिरिक्त और
कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है!"
उस फ़क़ीर के प्रत्युत्तरों ने अग्नि घृत का काम किया!
वे क्रन्तिकारी बहुत क्रुद्ध हो गए और बोले: "शीघ्र
ही हम तुम्हारे सारे साधुओंं को मार डालेंगे! फिर.… ?
वह बूढ़ा हंसा और बोला: "जैसी ईश्वर की मर्जी!"
"लेकिन हमने तो धर्म के सारे
चिन्हों को ही मिटा डालने का निशचय किया है!
ईश्वर का कोई भी चिन्ह हम संसार में न छोड़ेंगे!"
वह बूढ़ा बोला: "बेटे! यह बड़ा ही कठिन काम तुमने
चुना है, लेकिन ईश्वर की जैसी मर्जी! सब चिन्ह कैसे
मिटाओगे? जो भी शेष होगा, वही उसकी खबर देगा:
कम से कम तुम तो शेष रहोगे ही, तो तुम्ही उसकी खबर
दोगे! ईश्वर को मिटाना असंभव है, क्योंकि ईश्वर
तो समग्रता है!"
ईश्वर को एक व्यक्ति की भांति सोचने से
ही सारी भ्रांतियां खड़ी हो गई है! ईश्वर कोई
व्यक्ति नहीं! वह तो जो है, वही है! और ईश्वर में
विशवास करने के विचार से भी बड़ी भूल हो गई है!
प्रकाश में विशवास करने का क्या अर्थ? उसे तो आंखें
खोलकर ही जाना जा सकता है!
विशवास अज्ञान का समर्थक है और अज्ञान
एकमात्र पाप है!
आंखों पर पट्टियां बंधा विशवास नहीं, वरन पूर्णरूपेण
खुली हुई आँखोंवाला विवेक ही मनुष्य को सत्य ताल
ले जाता है!
और सत्य ही परमात्मा है! सत्य के अतिरिक्त और कोई
परमात्मा नहीं है ।।

॥ ओशो ॥

(मिट्टी के दीये)

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