Osho मन क्या है?

मन क्या है?
जो मनुष्य को दूसरोँ ने दिया है उसका जोड़ मन है।
जो मनुष्य है वह समाधि है।
समाधि दूसरोँ के द्वारा दिये गए कचरे मे दब गई है।
इस मन को विदा करो।
जो भी मनुष्य सोचता है,मन है।
जो भी मनुष्य विचारता हो,मन है।
लेकिन वह जो द्रष्टा है मन का भी,न सोचता न विचारता-वह तो केवल साक्षी है।
एक विचार उठा भीतर,अच्छा या बुरा कैसा भी हो-द्रष्टा देखता है उस विचार को उठते,उसको रुप लेते,उसको बनते,सघन होते,उसको विदा होते।
ये द्रष्टा ही चैतन्य है,मनुष्य का होना है।
और विचार तो सब बाहर से आ रहे हैँ।
जब अध्ययन करता है मनुष्य केवल तभी विचार बाहर से आता है ऐसा नही है।
जब कोई मनुष्य के मन मे विचार डाल जाता है तब विचार बाहर से आता है ऐसा नही है।
विचार बड़े परोक्ष मार्गोँ से भी आते हैँ।
कभी मनुष्य बैठा है शांत और अचानक उदासी घेर लेती है।
कोई कारण नही दिखाई देता।
कोई उदास मनुष्य गुजर गया पास से और उदासी की तरंग प्रवेश कर गई।
मन अत्यंत संवेदनशील है।
मन सारी तरंगो को पकड़ता रहता है-अनजाने।
जैसे मछली सागर मे है वैसे ही मनुष्य विचारोँ के सागर मे है।
मनुष्य इतना बलशाली नही है अभी कि अपने अनुसार विचारोँ को चुन सके।

एक टिप्पणी भेजें

[blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget