अंधेरा घना है लेकिन यदि प्रेम का दीपक जल जाए तो रोशनी हो जाए।

अंधेरा घना है लेकिन यदि प्रेम का दीपक जल जाए तो रोशनी हो जाए।
मनुष्य के भीतर जो सौन्दर्य छिपा है उसे प्रकट होने दे मनुष्य।
अंतस मे जो प्रेम दब पड़ा है-वो ही है अंगारा।
परमात्मा के प्रेम की मस्ती पीनी है।
उस मस्ती के पीने का नाम ही-
-भजन है।
-कीर्तन है।
-पूजा है।
लेकिन यदि बिना मस्ती के हो तो सब क्रियाकांड है।
जैसे मनुष्य किसी को गले लगाए,गले से लगाने के लिये कोई प्रेम का होना जरुरी नही है।
अभिनेता भी एक-दूसरे को गले से लगाते हैँ।मनुष्य भी लगा लेता है।
तो आलिंगन क्रियाकांड हो गया यदि अंतस मे प्रेम नही है।
और यदि अंतस मे प्रेम है तो गले लगाए तो अब आत्मा से आत्मा भी निकट आ रही है।
ऊपर से देखने पर दोनो एक जैसे दिखाई देते हैँ।
दोनो तरह के प्रेम की तस्वीर उतारें तो तस्वीर एक सी आएगी।
ये ही अड़चन है।
मीरा भी नाची और जिस पुजारी को तनख्वाह पर रखते हैँ वह भी नाचता है।
मीरा ने जो आरती उतारी उस आरती मे आत्मा का दीपक जला था।
पुजारी भी उतारता है।
यदि पुजारी की आत्मा का दीपक जलता तो वो भी मीराबाई जैसा हो जाता।
नौकरोँ से कहीँ प्रार्थनाएं हुई हैँ।
मनुष्य स्वयं भी इसी तरह प्रार्थना करता है।

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