नरवर का किला :– narwar fort


नरवर बुंदेलखंड की पश्चिमोत्तर सीमा पर शिवपुरी जिलांतर्गत सिंधनदी के दाये तट पर स्थित विशाल पहाड़ की पूर्वी तराई के मध्य भाग में अहीर नदी के वाये भाग में 25–39 उत्तरी आक्षांश एवं 77–51 पूर्वी देशांतर पर स्थित है। नरवर ग्वालियर से 112 किलोमीटर, करैरा से 56 और झाँसी से 80 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां की भूमि चचरीली है। भूमि का पोषक तत्व नदियों, नालों एवं सिंध के खंडडरों से बहकर सिंध से चला जाता है। चचरीली भूमि होने से कच्चा लोहा यहां पाया जाता है, लेकिन उसके दोहन को तरजीह नही दी गई। सिंध नदी के दाये किनारे उत्तर से दक्षिण की ओर फैली विंध्य श्रेणी है, जो उत्तर की ओर चौड़ी फैली है, तथा दक्षिण की ओर कम चौड़ी संकरी है।
यह श्रेणी नरवर नगर के भूमि आधार से 475 फीट एवं समुद्रतल से 1600 फीट ऊंची है। इसी ऊंची श्रेणी पर राजा नल का दुर्ग (नरवर दुर्ग) बना है। जो लगभग 8 किलोमीटर के घेरे में है। नरवर दुर्ग के पूर्वी अंचल में पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर लंबवत् एक दूसरा पहाड़ है, जिसे हजीरा पहाड़ कहते है, क्योंकि इसके पश्चिमी भाग के शिखर पर दो कलात्मक हजीरा निर्मित है। विन्घ्य श्रेणी पर नलपुर दुर्ग जिसके दक्षिण–पश्चिम एवं उत्तर में सटी सिंध एवं पूर्व से अहीर नदी मानो प्रकृति ने चारो ओर से इसे नदियों की करधनी पहनाकर भूमितल पर ही प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान कर दी है।
नरवर का किला बुंदेलखंड में पहले एवं मध्य भारत के ग्वालियर किले के बाद दूसरे नंबर का है। नरवर दुर्ग नाग राजाओं की राजधानी था, जहां 9 नाग भीम नाग (57–82ई.), खुर्जर नाग (82–107ई.), वत्स नाग (107–132ई), स्कंधनाग (132–187), बृहस्पति नाग (187–202ई.), गणपति नाग (202–226ई.), व्याग्र नाग (226–252ई.), वसुनाग (252–277), देवनाग (277–300ई.) ने राज्य किया था। समुद्र गुप्त ने नाग राजाओं के वैभव को नष्ट करने हेतु उन पर आक्रमण किया था तथा उन्हें श्रीहीन कर यत्र तत्र विखंडित कर दिया था, जिसका उल्लेख इलाहाबाद स्तंभ में है। नरवर दुर्ग में अनेक हिंदू मंदिर निर्मित है।

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